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उर्दू मीडिया: छोटे प्रदेशों की वकालत

केंद्र सरकार ने तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की हरी झंडी क्या दिखाई देश के कई हिस्सों में छोटे राज्य की मांग और वकालत फिर शुरू हो गई। ज्यादातर उर्दू अखबार इसके हक में हैं। एक अखबार तो यहां तक कहता है सवा अरब की आबादी वाले इस मुल्क में सौ प्रदेश बन भी जाएं तो खास फर्क नहीं पड़ेगा। ‘हमारा समाज’ में सैयद अतहर अली अपने लेख ‘पचास रियासतें बन जाने पर भी हर्ज क्या है’ में छोटे राज्यों की जमकर वकालत करते हैं। उत्तर प्रदेश में हरित क्षेत्र, रूहेलखंड, अवध, मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड, विध्यांचल, महाकाशौल, जम्मू-कश्मीर में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड, कारबी अलुंस, गुजरात में सौराष्ट्र, महाराष्ट्र में विदर्भ, कर्नाटक में करग और केरल में श्रवण प्रदेश

बनाने की पुरानी मांग चली आ रही है।

बिहार से भी मिथलांचल, मगधांचल और भोजपुरी प्रदेश की आवाज गाहे -बगाहे उठती रहती है। सिर्फ बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश  के जिलों को मिलाकर दस नए सूबे बनाए जा सकते हैं। एक अखबार कहता है तत्तकाल 21 और रियासतें बना दी जाएं तो देश में छोटे राज्यों को लेकर चल रहे तमाम आंदोलन न केवल सिमट जाएंगे, तरक्की और विकास के लिहाज से भी यह मुल्क के लिए बेहतर रहेगा। एक अखबार में असगर अंसारी अपने लेख ‘ उत्तर प्रदेश की तकसीम का मामला’ में कहते हैं-सत्तर जिलों वाले इस सूबे से अलग पूर्वाचल बनाना आम लोगों के हित में रहेगा। एक अखबार बुंदेलखंड का समर्थन करते हुए कहता है कि इसकी तेलंगाना से भी ज्यादा पुरानी मांग है। शिव सैनिकों को काबू में करना है तो महाराष्ट्र में विदर्भ का गठन जरूरी है।
 
पृथक राज्य बनाने के बावजूद झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ की बदहाली में खास फर्क नहीं आने का हवाला देकर छोटे राज्यों का विरोध करने को अखबार सही नहीं मानते। ‘औरंगाबाद टाइम्स’, ‘नई रियासतों का क्याम’ में कहता है भाषाई लिहाज से जितने प्रांत बने, वहां से अलग राज्य बनाने की मांग ज्यादा उठ रही है। तेलंगाना आंध्र प्रदेश का वह हिस्सा है जहां उर्दू और हिंदी बोली जाती है। राज गोपालाचार्य भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने के खिलाफ थे। जिस देश में हर पचास किलोमीटर पर भाषा बदल जाए वहां रियासतों के बंटवारे की मांग उठना लाजमी है। ‘साहाफत’ में जफर आगा अपने लेख ‘अलहदा तेलंगाना! आ बैल मुङो मार’ में कहते हैं कोई शक नहीं दो दशकों में जिस इलाके में मुल्क की तरक्की का असर नहीं पहुंचा वहां से छोटी रियासतों की मांग उठ रही है। तेलंगाना के अलग प्रदेश की मांग के पीछे भी इलाके की बदहाली और उपेक्षा है। आंध्र प्रदेश में विकास के जितने प्रोजेक्ट गए उसका सारा लाभ रायलसीमा और आंध्र के इलाके उठा रहे हैं। तेलंगाना होकर गुजरने वाली कृष्णा और गोदावरी नदियों का ज्यादातर पानी भी सूबे के उसी हिस्से के काम आ रहा है। उर्दू मीडिया तेलंगाना की मांग का जितना समर्थन कर रहा है। उतना ही तेलंगाना राष्ट्र समिति के सदर चंद्रशेखर राव के आचानक आमरण अनशण शुरू करने और इसके दबाव में आकर केंद्र के अलग राज्य के ऐलान की आलोचना कर रहा है। अखबार कहते हैं कि इस घटना से वक्त के धूल में दबी अलग प्रदेशों की मांग फिर सुलग उठी है। आंध्र में भी तेलंगाना का जबर्दस्त विरोध शुरू हो गया है।

हैदराबाद से प्रकाशित रोजनामा ‘मुंसिफ’ कहता है राव के आमरण अनशन के आगे घुटने टेकने से देश भर में संदेश गया कि केंद्र दबाव की भाषा समझता है। अब तो ऐसे आंदोलनों में अनाम पार्टियां भी कूद पड़ी हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी में कांग्रेस को कमजोर करने के लिए छोटे राज्य की सियासत छेड़ दी है। होना यह चाहिए था कि तेलंगाना के मसले पर राव आंध्र प्रदेश में सभी पार्टियों के साथ मिलकर आम राय बनाते। फिर एसेंबली से अलग राज्य का प्रस्ताव पास करवा कर पार्लियामेंट में भेजा जाता। उसके बाद विधिवत अलग प्रदेश की घोषणा की जाती। ‘तेलंगाना की हद’ में अखबार कहता है। इसके लिए चंद्रशेखर राव का एहतराम करना चाहिए। अपनी भूख हड़ताल से तेलंगाना की उपेक्षा की ओर पूरे देश का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। अब तक कांग्रेस और गैर कांग्रेसी पार्टियां तेलंगाना के नाम पर वहां की जनता को ठगती रही हैं। केंद्र का ताजा फैसला भी सिरे चढ़ेगा। इसमें भी संदेह ही है। ‘सियासत’ ने तेलंगाना का मसला संजीदगी से उठाने की तारीफ की है। उर्दू अखबार चंडीगढ़ की तरह हैदराबाद को केंद्र शासित क्षेत्र बनाए जाने की मुखालफत कर रहे हैं।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं 
malik_hashmi64@yahoo.com

 

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