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विकास जरूरी है, विभाजन नहीं

पृथक तेलंगाना राज्य की मांग की आंच उत्तर प्रदेश में भी महसूस की जा रही है। देश के इस सबसे बड़े प्रदेश को मुख्य रूप से पूर्वाचंल, बुंदेलखंड और हरितप्रदेश में विभाजित करने की मांग उठी है। मध्य उत्तर प्रदेश के बचे हिस्से को तब उत्तर प्रदेश या शायद कोई अन्य नाम दिया जा सकेगा। समाजवादी पार्टी यूपी के संतुलित विकास की पक्षधर है। वह विभाजन के खिलाफ है।

उत्तराखंड के बंटवारे में अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश का केन्द्र की राजनीति में जो दबदबा था वह नहीं रह गया। केन्द्र के सत्ता समीकरण में अभी उत्तर प्रदेश की निर्णायक भूमिका होती है। लोकसभा में उत्तर प्रदेश से 80 सदस्य निर्वाचित होते हैं। प्रदेश की इस ताकत से ईष्र्यालु तत्व इसके प्रभाव को समाप्त करने के लिए ऐसी साजिश कर रहे हैं।

देश और प्रदेश के समक्ष गरीबी, भुखमरी, मंहगाई, बेकारी, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आतंरिक और सीमा सुरक्षा जैसे गंभीर मसले हैं। इनसे निपटने में असमर्थ केन्द्र सरकार भी नये-नये विवादों को प्रोत्साहित कर रही है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री इस साजिश में स्वयं को इसलिए शामिल कर रही हैं कि उनका जनाधार और लोकप्रियता दोनों निरंतर घटती जा रही है। कई दलों को अगले विधान सभा चुनाव में उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा है। वे प्रदेश को कई टुकड़ों में बांटकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं। हर मुद्दे पर केन्द्र सरकार को चिट्ठी लिखने को अपनी सरकार चलाने की शैली बना चुकी मुख्यमंत्री अलग राज्य बनाने के मामले में भी केन्द्र को पत्र लिख रही हैं। हैरानी की बात यह है कि इन चिट्ठियों में वे यह लिखने से भी गुरेज नहीं कर रहीं कि जिन इलाकों को अलग राज्य बनाने की मंशा है वहाँ के लोग इस मुद्दे पर केन्द्र के खिलाफ जोरदार तरीके से आवाज उठाएँ।

बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने अपने हर कार्यकाल में ताबड़तोड़ जिले बनाए। उनकी हालत यह रही है कि शुरूआत में कई नए जिलों के डीएम-एसपी को घर और दफ्तर तक नहीं हासिल हो पाए। कोई पुराने गेस्ट हाउसों में रुका, कोई किसी सर्किट हाउस में। किसी -किसी का दफ्तर आवास पड़ोसी जिले में बना रहा। नए मुख्यालयों के निर्माण, स्टाफ, अवस्थापना पर भारी धनराशि खर्च करनी पड़ी। दरअसल प्रदेश को कई राज्यों में बांटने की ताजा कोशिशों के पीछे राजनीतिक स्वार्थ है और अपनी प्रशासनिक अक्षमता को छिपाने की चाल। पूर्वांचल और बुंदेलखंड के गठन में पड़ोसी बिहार तथा मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों को जोड़ने का मसला सामने आएगा। ऐसे में आंदोलन भी भड़क सकते हैं। छोटे राज्य बनेगें तो केंन्द्र की सहायता पर निर्भर रहेगें। ऐसे में केन्द्र का हस्तक्षेप बढ़ने की आशंका हमेशा बनी रहेगी।

प्रशासन चुस्त हो, भ्रष्टाचार पर अंकुश हो, विकास पर ध्यान हो, संचार परिवहन की सुविधाएं हो तो राज्य की प्रगति तेज होगी। महज बड़ा आकार प्रदेश के बंटवारे का पैमाना नहीं हो सकता। बड़े आकार की अपनी खासियतें होती हैं। इनका बेहतर इस्तेमाल बड़े आकार वाले राज्य को विकास की दौड़ में आगे ले जाने में सहायक हो सकता है। बड़े आकार को प्रदेश के प्रशासनिक संचालन में रोड़ा मानने की मानसिकता दरअसल प्रशासन चलाने में नाकाम राजनेताओं का तर्क है। वे अपने राज में फैले कुप्रशासन से ध्यान हटाने के लिए छोटे राज्यों से ही अच्छा प्रशासन हो पाने का ऐसा तर्क गढ़ते हैं जिसका दरअसल यथार्थ से वास्ता नहीं। उत्तर प्रदेश के विभाजन को लेकर इसी तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। छोटा आकार ही बेहतर प्रशासन का पैमाना होता तो भौगोलिक व आबादी के मायने में छोटे राज्य सु-प्रशासन में अव्वल होते। हकीकत में ऐसा नहीं है। 

एक नए राज्य की राजधानी बनने पर 5000 एकड़ उपजाऊ जमीन चली जाएगी। नए राज्यों के निर्माण के समय राजधानी, प्रशासनिक कार्यालयों, अधिकारियों के आवास तथा अन्य सुविधाओं पर अरबों रूपए खर्च होगें। इतना भार बर्दाश्त करना आसान नहीं होगा। इस शिगूफे से पूरा प्रदेश तहस-नहस हो जाएगा। इससे ब्रज, रूहेलखण्ड, अवध, सोनांचल की तरह छोटे-छोटे दूसरे राज्यों की मांग भी उठने लगी है।

पंजाब, हरियाणा और उत्तराखण्ड के निर्माण के बाद उनकी राजधानी कहां हो यह विवाद अभी तक सुलटा नहीं है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु के बीच जल विवाद है। तेलगांना नया राज्य बना तो उसकी राजधानी हैदराबाद हो या नहीं, इस पर अभी से विवाद हो रहा है। छोटे राज्य आत्म निर्भरता में पीछे रहते हैं। ऐसे राज्यों में संसाधनों का अभाव रहता है। प्रशासनिक व्यय बढ जाते है। कर्मचारियों के बंटवारे, जल विवाद के साथ राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ने का संकट रहता है।

अब तक का अनुभव बताता है कि झारखण्ड, जो सन् 2000 में बना, भूख गरीबी, बेकारी से त्रस्त है। आर्थिक विकास दर पिछड़ी है। नौ वर्ष में चार मुख्यमंत्री बदले। 23 माह में 4000 करोड़ रूपए के घोटाले हो गए। नक्सली आन्दोलन के उभार में 1500 लोग मारे गए। आठ वर्ष से माओवादी हिंसा में 24 से ज्यादा जिले प्रभावित हुए है। छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अव्यवस्था के साथ माओवादी हिंसा से भी यहां का जनजीवन त्रस्त है। उत्तराखंड में कर्ज लेकर सरकारी खर्च चल रहा है। केन्द्र से बराबर धन की मांग होती है। वर्ष 2012 तक कर्ज निपटाने के लिए राज्य को 2,200 करोड़ रूपए चाहिए। विकास दर गिरी है और भ्रष्टाचार बढ़ा है। छोटा अरूणाचल राज्य असुरक्षित है। चीन यहां हस्तक्षेप कर रहा है। वह कई बार घुसपैठ कर चुका है और सरकार असहाय सी है।

ऐसे में उत्तर प्रदेश के विभाजन की मांग पूर्णत: अव्यवहारिक है और एक साजिश के तहत की जा रही है। बुंदेलखंड-पूर्वाचंल आज सरकारी अक्षमता के कारण बेकारी, कुपोषण, भुखमरी के शिकार और उद्योगविहीन हैं। अपराधिक तत्वों का बोलबाला है। नए राज्यों में आर्थिक असंतुलन और क्षेत्रीय विषमता का प्रभाव होगा। बिजली पानी के बंटवारे को लेकर नए-नए विवाद पैदा होगें। सामाजिक संतुलन बिखरने की भी समस्या होगी। पर्यावरण संकट बढ़ेगा। छोटे-छोटे दल सत्ता में आएगें तो मधु कोड़ा का इतिहास दुहराने की सम्भावनाएं प्रबल होंगी। बड़े राज्य छोटे राज्यों से बेहतर विकास कर पाते है।

लेखक समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष हैं

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