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तेलंगाना : हड़बड़ी के जोखिम

केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को भी यह अनुमान नहीं रहा होगा कि तेलंगाना के बारे में आधी रात को की गई उनकी घोषणा के इतने व्यापक, विविध और जटिल परिणाम निकलेंगे। यह घोषणा तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन को समाप्त करने के लिए की गई थी। उनके अनशन का ग्यारहवां दिन चल रहा था और तब तक उनकी देखरेख कर रहे डाक्टरों की तरफ से चिंताजनक खबरें आने लगी थीं। गृहमंत्री और कई केंद्रीय नेता जानते थे कि तेलंगाना के बारे में दिए गए आश्वासन से इस तरह के कई अलग राज्यों की  लंबित मांगे उठ खड़ी होंगी। मंत्री को भरोसा था कि इन मांगों को बिना किसी दिक्कत के संभाल लिया जाएगा।

लेकिन उनको यह अनुमान नहीं था कि आंध्र प्रदेश के भीतर से क्या प्रतिक्रिया उठेगी। यह कह पाना मुश्किल है कि क्या तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा से पहले क्या 1972-73 में हुए आंध्र प्रदेश के आंदोलन को याद करते हुए उस पर ठीक से विचार किया गया था। लेकिन एक बात साफ है कि पिछले हफ्ते यह अनुमान नहीं लगाया गया था कि घटनाएं क्या करवट लेंगी। घोषणा के बाद ही पूरे राज्य में एक साथ आंदोलन छिड़ गए।

यह आंदोलन हिंसक थे और विश्वविद्यालय के छात्रों के हाथ में थे जिनका मकसद अलग-अलग था। तटीय आंध्र में आंध्र को अलग राज्य बनाने की मांग के साथ तो रायलसीमा में उस इलाके को अलग राज्य बनाने के लिए और तीसरा आंदोलन इन सब के विरोध में आंध्र प्रदेश को एक रखने के लिए खड़ा हुआ। इस दौरान विश्वविद्यालय परिसर रणक्षेत्र बन गए और स्वभाव के अनुरूप पुलिस ने उनका दमन करने के लिए क्रूरता का प्रदर्शन किया। अभिभावकों विशेषकर माताओं ने पुलिस के दमन का विरोध करते हुए आंदोलन में शिरकत की।
इससे जनप्रतिनिधियों पर दबाव बना और अनशन जिसे केसीआर ने तेलंगाना के लिए किया था वह चारों तरफ होने लगा।

हर कोई यह संतुलन बिठाने में लगा हुआ था कि किस तरह उसके क्षेत्र के लोग उसके साथ बने रहें। नतीजतन हर बड़ी पार्टी में सीधा विभाजन हो गया। इस मौके पर हर राजनेता राजनीतिक लाभ लेने की फिराक में लगा हुआ था इसलिए जमकर तीखी टिप्पणियों की बरसात की गई। इनमें से कुछ किसी नेता के पक्ष में होती थीं तो कुछ किसी के विपक्ष में। बिगड़ती स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री ने संयम बरतने के लिए एक लाइन की अपील जारी की लेकिन उसका किसी पर असर ही नहीं पड़ा। हालांकि उसका सभी ने स्वागत किया। अब उन स्थितियों पर भी बहस छिड़ी हुई है जिनके चलते पिछले हफ्ते तेलंगाना के बारे में ऐसी अशुभ घोषणा करनी पड़ी।

अब कांग्रेस में यह आमराय बन चुकी है कि नए राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा समय से पहले थी। चूंकि यह घोषणा केसीआर के आमरण अनशन को देखते हुए की गई थी इसलिए उसकी तुलना 1952 में तेलुगू भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग पर अनशन करन वाले पोट्टी श्रीरामुलू से की गई। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भाषाई राज्यों को चलते संकीर्ण भावनाएं फैलने का खतरा लग रहा था इसलिए वे तब तक नहीं पसीजे जब तक छह हफ्ते का अनशन कर श्रीरामुलू मर नहीं गए।

इसलिए विद्वान हैरान हैं कि सब कुछ जानते हुए भी सोनिया गांधी ने इतनी जल्दी हथियार कैसे डाल दिए। कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर के बीच इस पर जो राय बनी थी उसके चलते ऐसा हो ही नहीं सकता था। दरअसल तेलंगाना की घोषणा में युवा नेता राहुल गांधी की इस राय ने अपनी भूमिका निभाई कि कि अनशन जितनी जल्दी समाप्त हो उतना ही अच्छा। पहले केसीआर का अनशन तोड़ो फिर तेलंगाना मुद्दे से निपटो, राहुल गांधी की योजना यहां तक तो ठीक है। लेकिन इस योजना से जो संदेश निकल रहा है उसको लेकर चिंता हो रही है। हमारे संसदीय लोकतंत्र और संवैधानिक प्रक्रिया के लिए यह बात खतरनाक हो सकती है कि कोई उस पर दबाव डालकर, हिंसा करके और अवरोध डालकर सरकार को झुका सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का भी यही मानना है। द्रमुक नेता तेलंगाना मसले पर सरकार की पहल से नाराज थे। उनका कहना था कि इस बात से हम समझ सकते हैं कि न तो देर से घोषणाएं करनीं चाहिए न ही जल्दबाजी में फैसले करने चाहिए। वे पीएमके नेता रामदास की तमिलनाडु के विभाजन की मांग से भी चिंतित हैं।  

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

radhaviswanath73@yahoo.com

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