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मृत्यु का अधिकार

युद्ध, आतंकवाद और बात-बात में किसी की जान लेने वाली घटनाओं के बीच जब पता चलता है कि हमारा सुप्रीम कोर्ट मुंबई की एक पूर्व नर्स अरुणा शानबाग नाम की एक ऐसी स्त्री के मृत्यु के अधिकार पर बहस कर रहा है जो पिछले 36 साल से एक जिंदा लाश बनी हुई है, तो हैरानी होती है। यह एक पाखंड भी लग सकता है। लेकिन यही सभ्य समाज का नैतिक मूल्य है। सभ्य समाज जीवन के अधिकार को सर्वाधिक महत्व देता है और उसमें अगर कटौती करता है या मृत्यु का अधिकार देता है तो किन्हीं विशेष परिस्थितियों में।

लेकिन जब मृत्यु का अधिकार ही किसी के लिए जीवन के अधिकार जैसा हो जाए तो क्या किया जाए? पर व्यक्ति को अपनी मृत्यु का अधिकार देने के रास्ते में तमाम तरह की नैतिक और कानूनी दुविधा है। असह्य पीड़ा और न ठीक होने लायक बीमारी के शिकार व्यक्ति को भी मृत्यु का अधिकार देने में गंभीर दार्शनिक और व्यावहारिक दिक्कतें रही हैं। अगर यह अधिकार दे दिया गया तो कहीं सहने लायक पीड़ा को भी असह्य बताकर आत्महत्याओं का सिलसिला न शुरू हो जाए। दूसरी तरफ यूरोप में आल्बेयर कामू और अन्य अस्तित्ववादी दार्शनिकों ने अगर आत्महत्या के अधिकार की मांग को जोरदार तरीके से उठाया तो भारत में हिंदू धर्म में समाधि लेने और जैन धर्म में संथारा की परंपरा रही है।

कानूनन इसकी इजाजत न होते हुए भी इसे अपनाने की घटनाएं सुनाई पड़ती रहती हैं। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के चलते मृत्यु का अधिकार देने की मांग भारत सहित पूरी दुनिया में उठती रही है। कहीं उसे विशेष परिस्थितियों में इजाजत मिल गई है तो कहीं अभियान चल रहे हैं।

स्विटजरलैंड में इसकी इजाजत 1942 से ही रही है। आत्महत्या वहां अभी भी जुर्म है। लेकिन दवाओं के भारी खुराक के सक्रिय उपाय के माध्यम से मृत्यु के अधिकार को अंजाम दिया जा सकता है। जिसका फायदा तमाम देशी -विदेशी लोग उठाते रहे हैं। मृत्यु के अधिकार का दूसरा पहलू निष्क्रिय उपाय वाला है। इसके तहत इलाज, डायलसिस, कीमोथेरापी, कृत्रिम स्वसन या आईवी ड्रिप को बंद कर दिया जाता है। यह उपाय पिछले दस सालों के भीतर दुनिया के कई देशों में कड़ी निगरानी के तहत मंजूर किए गए हैं। भारत में भी विधि आयोग ने इसी तरह की अनुमति का सुझाव दिया है। लेकिन भारत जैसे जटिल और कई स्तरों पर जीने वाले समाज में इसकी छूट कुछ मामलों में भले मिल जाए पर इसके पक्ष में कानून पास करना आसान नहीं होगा।

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