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संघर्ष की नर्सरी

यह मौसम स्कूलों में भरती का है और पिछले वर्षो में तमाम विचार विमर्श और बदलाव की कोशिशों के बावजूद स्कूलों में भरती की स्थिति वहीं की वहीं है। आज भी तमाम मध्यमवर्गीय मां-बाप अपने तीन-चार साल के बच्चों को लिए स्कूल में भरती के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारा शिक्षा तंत्र ऐसा है जैसे वह इसी उम्र से बच्चों को भविष्य  की जद्दोजहद की प्रैक्टिस करवा रहा हो। मां-बाप ढेर सारा श्रम और पैसा तो स्कूलों के भरती के फॉर्म पाने में ही लगा देते हैं फिर बच्चे और मां-बाप के इंटरव्यू के लिए तैयारी और खूब एड़ियां रगड़ने के बाद किसी स्कूल में एडमिशन मिल गया तो वहां हजारों और कभी-कभी लाखों रुपए देने की तैयारी।

यह स्थिति न अदालती आदेशों के बाद सुधरी है न शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के कानून के बाद। इसकी बुनियादी वजह यह है कि शिक्षा हमारे समाज में एक ऐसी वस्तु या कमोडिटी है जिसके मिलने न मिलने या सही ब्रांड के मिलने न मिलने पर भविष्य निर्भर करता है। इस शिक्षा के बाजार में मांग और पूर्ति के बीच जबरदस्त असंतुलन है इसलिए यह विक्रेता का बाजार है और इसमें ग्राहक को सिर्फ घुसने के लिए ढेर सा पसीना और पैसा बहाना पड़ता है। मांग और पूर्ति के बीच यह असंतुलन पहले इतना स्पष्ट इसलिए नहीं था क्योंकि समाज का एक बड़ा तबका इस बाजार के बाहर ही था। धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक कारणों से ज्यादा लोग शिक्षा के तलबगार हो रहे हैं और स्कूल उस मुकाबले नहीं बढ़ रहे हैं।

हमारे यहां शिक्षा की तमाम नीतियां जमीनी हकीकत को नजर में रखकर नहीं बनाई जातीं। या तो वे घोर आदर्शवादी नजरिए से बनती हैं या जबरदस्त अभिजात नजरिए से। इसके चलते सरकारी स्कूलों का लगातार पतन हो रहा है और निजी स्कूल उस तादाद में नहीं हैं, जितनी जरूरत है। पहली जरूरत तो यह है कि सरकारी और निजी स्कूलों में एक निश्चित गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए, दूसरे गुणवत्ता से समझौता किए बिना समाज के हर वर्ग के लिए, हर क्षेत्र के लिए स्थानीय जरूरतों के हिसाब से निजी सकूल खोलने दिए जाएं। शिक्षा के अधिकार के तहत जो नियम बनाए गए हैं उनमें या तो सरकारी स्कूल रह सकते हैं या बहुत महंगे स्कूल। जब तक स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कल्पनाशील और लचीली नीतियां नहीं होंगी, शिक्षा के बाजार में असंतुलन बना रहेगा, और शिक्षा पहली सीढ़ी पर ही संघर्ष बना रहेगा।

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