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साबुन लगाने से नहीं खुलता स्वर्ग का दरवाजा

सन 88 में गंगा का पाट काफी चौड़ा था। 2009 में यह काफी संकुचित हो चला है। इसी सोमवार की बात है। गंगाआरती देखने की तीव्र इच्छा थी। एक साथी को लेकर आरती देखने पहुंचा। आरती सवा छह बजे शुकु हुई। हम लोग दशाश्वमेध घाट पर बैठ कर गंगा मईया को निहार रहे थे। लगा, गंगा मईया बहुत तेजी के साथ खुद को समेटती जा रही हैं। जिस चौड़ाई में हमने गंगा को देखा था, उस चौड़ाई को देखने के लिए आंखें तरस गईं। जी हां, मुझ जैसे परदेसी के लिए गंगा लुप्तप्राय ही प्रतीत हो रही हैं।


गंगा घाट गंदले हो रहे हैं। अपशिष्ट पदार्थो का गंगा में विसजर्न जारी है। वहां पुलिस वाले हैं पर उन्हें सुर्ती मिलने से फुरसत मिले तब न। फुरसत मिलती भी है तो विदेशी सैलानियों से बकरबोंच करते हैं ताकि दो पैसे की आमदनी हो जाए। उन्हें जिस काम के लिए लगाया गया है, उस काम को करने में उनकी कोई रुचि दिखती ही नहीं।


दशाश्वमेध के बायें-दाएं जितने भी घाट हैं, हमारे जुनूनी साथी ने टहला दिया। हर जगह गंदगी। हर जगह नियमों को तोड़ने की प्रतिबद्धता। यह तो बनारस का कल्चर नहीं? सैलानी हर नियम को मानते हैं, लोकल लोग हर नियम को तोड़ते हैं। एक सज्जन अमरूद खा रहे थे। कसैला लगा तो उन्होंने मा की गाली दी और फेंक दिया उसे गंगा के आंचल में। यह घटना सोमवार की है। अमरूद तो प्रतीक है। अब साइंसदा अपनी खोपड़ी लड़ाएं कि अमरूद से गंगा का पानी खराब होगा या नहीं पर यह एप्रोच ठीक कहा जाएगा? अमरूद ही नहीं, वहां झाल-मूढ़ी फेंकने वाले भी मिले। जुनूनी साथी ने उन्हें रोकने की भी कोशिश की तो भिड़ गए मानो गंगा के पानी पर उनका ही अधिकार है।


मोटी बात यह कि एसपी सिटी विजय कृष्ण या फिर जिलाधिकारी कितने भी आक्रामक क्यों न हो जाएं, गंगा निर्मलीकरण तब तक असंभव है, जब तक लोकल लोगों का एप्रोच न बदले। अस्सी वालों को यह समझाना पड़ेगा कि लक्स साबुन से नहाने और उसी से धोती साफ करने से स्वर्ग के दरवाजे नहीं खुलते। जब तक एप्रोच नहीं बदलेगा, यह प्रक्रिया व्यर्थ साबित होगी।

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