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गुप्त मसौदे पर काम कर रहे हैं विकसित देश: जयराम

गुप्त मसौदे पर काम कर रहे हैं विकसित देश: जयराम

शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन पर अधिकारियों में व्यापक समझौते की धूमिल आशाओं के बीच भारत ने गुरुवार को कहा कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री गोर्डन ब्राउन के नेतृत्व में मुट्ठी भर विकसित देश एक चौंकाने वाला राजनीतिक पाठ तैयार कर रहे हैं। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि ये नेता कुछ खुलासा करने के इच्छुक नहीं है और यह परेशान करने वाला तथा धूर्ततापूर्ण है।
     
उन्होंने कहा कि इस मसौदे का पाठ तैयार करने में किसी भी विकासशील देश को शामिल नहीं किया गया और चिंतित करने वाली बात यह है कि इसे विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों की शिखर बैठक में चौंकाने वाले कदम के रूप में पेश किया जाएगा जहां इसे रोकना और इसकी अंतर्वस्तु का विरोध करना कठिन होगा। रमेश ने कहा कि यदि इस चौंकाने वाले पाठ को लाया जाता है तो इसका विस्तार से अध्ययन मुश्किल होगा और यह किरकिरी का कारण भी बन सकता है।

बहरहाल अधिकतर अधिकारियों को आशा है कि राष्ट्राध्यक्षों की शिखर बैठक में अंतिम क्षणों में कुछ सफलता हासिल होगी। रमेश ने कहा कि कुल मिलाकर उद्देश्य देर, देर और देर करना है। वैश्विक वार्ताओं के दौरान शिखर सम्मेलन में जो कुछ हुआ, वह अभूतपूर्व है और वास्तव में भारत तथा अन्य देशों को सबसे अधिक हताश करने वाला है।
      
बहरहाल 12 घंटों के विलंब के बाद दो पाठों पर बुधवार शाम फिर से विचार-विमर्श शुरू हुआ और मंत्री ने पूरे दिन गंभीरता से बातचीत करने की अपील की। रमेश ने कहा कि मुझे अब भी भरोसा है कि दिन भर की बातचीत के दौरान कुछ सम्मानजनक नतीजा हासिल हो जाएगा। उन्होंने चिंता जताई कि जहां तक संभव होगा, विकसित देश प्रक्रिया में बाधा डालने और जहां तक संभव हो, उसे धीमा करने की कोशिश करेंगे।

रमेश ने दोहराया कि विकसित देशों का ध्येय क्योटो प्रोटोकाल का अवसान करना है और अभी यह इंटेंसिव केयर यूनिट में है लेकिन विकासशील देशों ने अगले दो तीन महीनों में दो पाठों की वैधता पर विचार-विमर्श शुरू करने का निर्णय किया है।
 
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों द्वारा विकासशील देशों को दोषी ठहराये जाने के दुष्प्रचार के प्रति हम सचेत हैं। वार्ताओं को पटरी पर लाने के लिए हमने अथक प्रयास किया है। रमेश ने कहा कि जिस प्रकार वार्ताएं हुई, पूरी प्रक्रिया में ही खोट था और भारी अविश्वास का वातावरण बना। विश्वास में इस कमी को दूर करने के लिए डेनमार्क की ओर से कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गये।

इससे पहले उन्होंने कहा कि अगर जलवायु परिवर्तन पर चल रही वार्ता विफल रहती है तो इसके लिए पूरी तरह से विकसित देश जिम्मेदार होंगे। भारत के पर्यावरण और वन मामलों के राज्यमंत्री जयराम रमेश ने गुरुवार को कोपेनहेगन सम्मेलन के दौरान उपरोक्त बातें कहीं।

खबरिया चैनलों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील विकासशील देशों के हितों की जोरदार तरीकों से रहनुमाई कर रहे हैं। अगर वार्ता असफल रहती है तो इसकी वजह क्योटो प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों द्वारा किए गए वायदों को पूरा नहीं करना होगी। वार्ता की असफलता का दोष विकासशील देशों पर नहीं मढ़ा जा सकता।

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