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पहली जरूरत है राज्य पुनर्गठन आयोग

उत्तर प्रदेश के विभाजन का मसला मूल रूप से छोटे प्रदेश बनाम बड़े प्रदेश का मसला नहीं है। उत्तर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों की विकास की जरूरतें अलग अलग हैं। उनके शासन प्रशासन की जरूरतें अलग अलग हैं। यह दअरसल विभाजन नहीं प्रदेश के पुनर्गठन की मांग है। और उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद जो प्रदेश बनेंगे वे कोई छोटे प्रदेश नहीं होंगे। उदाहरण के लिए आप हरित प्रदेश को ही लें। यह प्रदेश अगर बनता है तो कर्नाटक या राजस्थान के जितना बड़ा राज्य होगा। साथ ही यह पंजाब, हरियाणा, केरल जैसे कई राज्यों से काफी बड़ा होगा। पूर्वाचल भी अगर अलग प्रदेश बनता है तो यह कोई छोटा प्रदेश नहीं होगा। बुंदेलखंड इनमें से थोड़ा छोटा जरूर हो सकता है लेकिन उसके गठन की मांग तो सबसे पुरानी है।

पहले राज्य पुनर्गठन आयोग ने नया राज्य बनाने के लिए चार अर्हताएं तय की थीं- इनमें से पहली थी प्रशासन की सुविधा, दूसरी विकास की आवश्यकताओं में समानता, तीसरी वित्तीय स्वयत्ता और चौथी भाषाई व सांस्कृतिक एकता। हर मामले में यह जरूरी नहीं है कि ये चारों ही आवश्यकताएं पूरी हो रही हों। वित्तीय स्वायत्ता के मामले में बुदेलखंड थोड़ा पीछे हो सकता है। लेकिन अगर इसे अलग राज्य के रूप में मान्यता दी जाती है तो योजना आयोग वगैरह से जो पैसा आता है वह यहां ज्यादा फोकस्ड ढंग से खर्च हो सकेगा। 

छोटे राज्यों के नाम पर अक्सर पूर्वोत्तर के राज्यों के उदाहरण दिए जाते हैं और यह कहा जाता है कि ऐसे राज्य पिछड़ जाते हैं। लेकिन पूर्वोत्तर के राज्यों की समस्या अलग है। उनके बनने के कारण भी अलग हैं। वे आदिवासी पहचान पर आधारित राज्य हैं, या यह कह सकते हैं कि एथनिक पहचान के आधार पर बनाया गया है। इसलिए बनाया गया है कि वहां अलग अलग क्षेत्रों में रहने वालों की एथनिक पहचान के बीच एक तरह का तनाव था, यह तनाव न रहे इसलिए उन्हें अलग राज्य का दर्जा दिया गया। वहां राज्य बनाने में विकास का मसला था ही नहीं, और राज्य बनने के बाद विकास हुआ भी नहीं।

बहुत छोटे राज्य बनाने का समर्थन नहीं किया जा सकता। जैसे कुर्ग को अलग राज्य बनाने की बात चलती है, अब एक जिले को लेकर राज्य बनाने की बात तो नहीं ही मानी जा सकती। ऐसी ही दिक्कत गोरखालैंड में भी है। लेकिन यह समस्याएं उत्तर प्रदेश में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश का संतुलित विकास हो सके इसके लिए इसका पुनर्गठन जरूरी है। हरित प्रदेश बनना जितना जरूरी है उतना ही पूर्वांचल और बंदुलखंड का बनना भी है। खुद मैंने हरित प्रदेश के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जितनी रैलियां की है, जितनी सभाओं को संबोधित किया है, उससे कहीं ज्यादा कार्यक्रम मैने पूर्वी उत्तर प्रदेश में अलग पूर्वाचल बनाने की मांग पर किए हैं। उत्तर प्रदेश में इसके लिए कोई बहुत आक्रामक आंदोलन नहीं हुए हैं। धरने, प्रदर्शन या अनशन वगैरह भी नहीं हुए हैं। हमने इसके लिए बड़े पैमाने पर जन जागरण किया है। इस जनजागरण का ही असर है कि आज ज्यादातर लोग प्रदेश के पुनर्गठन की मांग पर सहमत हैं।

उत्तर प्रदेश में दिक्कत इसलिए भी नहीं है क्योंकि ज्यादातर राजनैतिक दल इसके समर्थक हैं। सिर्फ समाजवादी पार्टी ही है जो कुछ कारणों से इस तरह के पुनर्गठन का विरोध कर रही है, बाकी भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और हमारी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल इसका समर्थन कर रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी काफी समय से इस पुनर्गठन की मांग कर रही है। उसका विधानसभा में बहुमत है, इसलिए उसे इसका प्रस्ताव उसे विधानसभा में लाना चाहिए। बसपा ने अभी तक इस प्रस्ताव को लाने के बारे में कुछ नहीं कहा।

वैसे संविधान के हिसाब से यह कहीं जरूरी नहीं है कि अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा से पास हो। उसके हिसाब से तो नया राज्य बनाने का अधिकार पूरी तरह से केंद्र सरकार के पास है। इसकी परंपरा तब शुरू हुई जब पंजाब का विभाजन हुआ। उस समय न्यायालय ने यह कहा था कि इस संबंध में राज्य विधानसभा की राय भी ली जानी चाहिए। उस फैसले में भी न्यायालय ने विधानसभा की राय लेने के लिए कहा था अनुमति लेने के लिए नहीं। यानी विधानसभा की राय के बावजूद केंद्र सरकार अपना फैसला करने के लिए स्वतंत्र है। दरअसल राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पास होना एक ऐसा मसला है जिसके जरिये ऐसी मांग को थोड़े या काफी समय के लिए अटकाया जा सकता है। दरअसल यही तेलंगाना के मामले में हो रहा है।

तेलंगाना के मसले की पूरी तरह मिसहैंडलिंग भी हुई। अगर कोशिश यह की जाती कि सभी दलों को साथ लेकर के चंद्रशेखर राव का अनशन तुड़वाया जाता तो शायद समस्या इतनी उग्र न होती। अब वहां रायलसीमा को लेकर, हैदराबाद के सवाल को लेकर और कई अन्य वजहों से तरह-तरह की समस्याएं खड़ी हो रही हैं। यह कुप्रबंधन का नतीजा तो है ही साथ ही इस घोषणा के पीछे की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।

वैसे इस तरह की घोषणाएं भी अर्थहीन ही हैं। पहला काम तो यह होना चाहिए था कि दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया जाता। यह मांग लंबे समय से चल रही है लेकिन इसे लंबे समय से टाला जाता रहा है। जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो खुद कांग्रेस की तरफ से ही प्रधानमंत्री को इसके लिए एक चिट्ठी लिखी गई थी। अब एक लंबे समय से कांग्रेस की सरकार है और उसे वह नजरंदाज कर रही है। राज्य पुनर्गठन आयोग बने, वह नए राज्य के सारे दावों, इसकी सारी मांगों पर विचार करे। फिर वह फैसला करें कि कहां नया राज्य बनाना उचित होगा और कहां नहीं। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की राय वगैरह भी ली जा सकती है।
लेकिन दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग में वैसी राजनीति नहीं होनी चाहिए जैसी पहले आयोग में हुई थी। मांगों पर गुण दोष के आधार पर विचार होना चाहिए।

मसलन आज जो पश्चिम उत्तर प्रदेश है उसे अलग प्रदेश बनाने की मांग तब भी उठी थी। आयोग के सदस्य के एम पणिक्कर ने इसका खुलकर समर्थन किया था। उनका कहना था कि प्रशासनिक दृष्टि से इस क्षेत्र को एक अलग प्रदेश का दर्जा दिया जाना जरूरी है। आयोग के एक और सदस्य एच एन कुंजरू भी इसके पक्ष में थे। गोविंद बल्लभ पंत उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, वे नहीं चाहते थे कि प्रदेश का विभाजन हो इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ने दिया। इस बार कोशिश होनी चाहिए कि ऐसा न हो।

लेखक राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष हैं

(प्रस्तुति - हरजिंदर)

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