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साहित्य : पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र की भारतीयता

पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र हृदय से भारतीय थे। इसीलिए उनका अपना साहित्य भी शुद्ध भारतीय साहित्य है। एक बार आचार्य पद्मनारायण ने कामायनी सम्मेलन का एक बृहद आयोजन किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय महाविद्यालय के सभागार में लक्ष्मीनारायण मिश्र की उपस्थिति में कवि सम्मेलन आयोजित था। उसमें प्रसिद्ध कवि डॉ. शम्भुनाथ सिंह ने कविता पढ़ी ‘नदी के किनारे उषा की चिता जल रही थी’। इस पंक्ति को सुनते ही लक्ष्मीनारायण मिश्र उबल पड़े और बोले भारतीय वांग्मय का सर्वाधिक मांगलिक प्रतीक उषा को चिता कहना अभारतीयता है या भारतीयता पर प्रहार है।
    
मुझे मिश्र जी की हिन्दी अच्छी लगती थी। उसमें सहजता भी रहती थी और सार्थकता भी। लिंग संबंधी अशुद्धियां उनकी हिन्दी में नहीं मिलती थी। यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसका उल्लंघन बड़े-बड़े साहित्य धुरंधरों में सुलभ है। इस कारण भी दक्षिण भारत हिन्दी से भड़कता है।
    
साहित्यकार निहत्था माना जाता है। मां सरस्वती का एक वाहन मयूर भी है। यह हिंसक नहीं होता और इसकी चोंच पीली तथा पैर भी वैसे ही होते हैं। पीत वर्ण है माता गायत्री का। मायंत्री मंत्र त्रेवर्णिक को दिया जाता है और उसे बह्म मुहूर्त से सूर्योदय के पहले तक जपा जाता है। संध्या दोपहर में भी की जाती है, और गायत्री मंत्र का जप किया जाता है। इसी प्रकार सायंकाल भी सूर्यास्त के पहले। उदय के पूर्व और अस्त के पहले की सूर्य किरणें स्वयं गायत्री होती हैं। उनमें स्नान तथा मानसिक शांति की कामना कदाचित कोई बड़ी चिकित्सा होगी। 

इस अनुष्ठान में सूर्य से प्रार्थना है कि वह हमारे आंतरिक व्यक्तित्व को प्रेरणा दे। यही गायत्री मंत्र का अर्थ है। आज का समाज दिन को रात और रात को दिन बनाकर सुखी हो रहा है। यह बन गया है सभ्यता का अंग। शिष्ट वह जो इस विपर्यय का अभ्यासी हो। परन्तु भारतीयता इसके विरुद्ध है। उसमें कहीं भी कुछ भी पेट में डालना आत्मघात माना जाता है। पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र इस आचार के समर्थक साहित्यकार थे। हिन्दी के निर्माताओं में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के लेखक महर्षि दयानन्द का भी स्थान वैसे ही है जैसे हिन्दी पत्रकारिता के अतिहास में गोरखपुर के गीताप्रेस से प्रकाशित पत्रिका कल्याण का।

उसका अपना स्वर है और उस पर ध्यान देने वाले कुछ सम्पन्न भक्त भी हैं तथा विद्वान भी। भले ही आज की पत्रकारिता के इतिहास में कल्याण की गणना न की जाए, किन्तु कदाचित कल्याण से अधिक ग्राहकों की संख्या किसी भी हिन्दी-मासिक पत्रिका को प्राप्त नहीं है। इस तथ्य को पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र स्वीकार करते थे।
अब साहित्य को पीछे रखकर ‘इतिहास और संस्कृति’ आगे बढ़ गए हैं, किन्तु इनका प्राण है अंग्रेजी भाषा। साहित्य के शोध क्षेत्र में  भी अंग्रेजी का राज्य है। अंग्रेजी भाषा का प्रचार और प्रसार इतना अधिक है कि प्रसिद्धि उसी से संभव है।

1893 में स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में अपमानित वक्ता के रूप में जो वक्तव्य किया था वह अंग्रेजी में था। जहां स्वामी जी ने पहला भाषण केवल दो मिनट का दिया था वहां अगले 11 दिनों तक उनके स्वतंत्र व्याख्यान आयोजित किए गए। उन्हें सुनने आसपास के हजारों श्रोता पहुंचते। उनके भाषण के इस चमत्कार का कारण भारतीयता कम, अंग्रेजी भाषा अधिक है। स्वामी जी के संप्रदाय के प्रचारक भी उसी प्रकार अंग्रेजी भाषा-भाषी हुआ करते हैं जिस प्रकार अरविन्दाश्रम के प्रचारक। लक्ष्मीनारायण मिश्र इस छिद्र को जानते थे और हिन्दी साहित्य के अतिहास में रामचन्द्र शुक्ल द्वारा प्रथम गद्य कृति के रूप में- इंशाअल्ला खां की ‘रानी केतकी की कहानी’ को जो महत्व दिया गया उसे अमान्य करते हुए संस्कृत भाषा में लिखित विराट साहित्य को याद करते थे।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के मुख से हमने स्वयं सुना है कि उन्होंने पूरा महाभारत अठारह बार पढ़ा था। कालिदास, बाणभट्ट और शूद्रक की रचनाओं के तो बिम्बग्राही अध्येता थे। यह उनकी ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’- नाम से लिखित गद्यरचना से भी स्पष्ट है, ‘पुनर्नवा’ से भी और ‘अनामदास के पोथा’ से भी। क्षेत्र हिन्दी का, किन्तु महान पाण्डित्य प्राचीन धरोहर यानी संस्कृत साहित्य का। हिन्दी लेखकों की तत्कालीन पीढ़ी की यह विशेष थी, भले ही हिन्दी के हठी इतिहासकार इस तथ्य को दरकिनार कर दें। तब उन्हें महावीरप्रसाद जी द्विवेदी को भी हिन्दी से बरखास्त करना होगा। लक्ष्मीनारायण मिश्र भी उन्हें रचनाकारों में निकाल बाहर किए जाएंगे। यह प्रवृत्ति हिन्दी में इस प्रकार बढ़ चुकी है कि अब काशी के महान साहित्यकार संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास, केवल कथावाचकों तक सिमट गए हैं और अब प्रसाद की कामायनी भी लगभग लुप्त हो रही है।

लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार और समीक्षक हैं

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