class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्योटो पर अटके

कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन क्योटो संधि के पक्ष और विपक्ष में बंट चुका है और अब इसे विफल होने से आखिरी दिन का कोई चमत्कार ही बचा सकता है। स्पष्ट तौर पर यह स्थिति निराशाजनक है, लेकिन इसमें एक बड़ी उम्मीद क्योटो के पक्ष में विकासशील और गरीब देशों की एकता का उभरना है।

आशंकाओं के विपरीत चीन और भारत दोनों यहां अफ्रीकी देशों के साथ खड़े हैं। हालांकि उन्हें ज्यादा मजबूती चीन के होने से मिल रही है और शायद औद्योगिक देशों को कड़ी चुनौती भी इसी नाते दी जा सकी है। विकसित देशों की एकता को तो दुनिया मान कर चलती है, लेकिन मंदी के दौर में वह एकता टूटने के बजाय और मजबूत हुई है। बल्कि अगर यह कहा जाए कि उन देशों ने मंदी से उत्पन्न परेशानी को क्योटो विरोध की जिद से जोड़ लिया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

औद्योगिक देश यह महसूस कर रहे हैं कि मंदी के दौर में जहां चीन ने आर्थिक मजबूती दिखाई वहीं यूरोप और अमेरिका के देशों में नौकरियां गई हैं। वे जब दोनों को जोड़कर देखते हैं तो इसमें कहीं न कहीं चीन और भारत जैसे देशों के प्रति ईष्र्या भाव पालते हुए उन्हें अपनी परेशानियों के लिए जिम्मेदार मानने लगते हैं। ऐसे में मंदी से तंग उन देशों को यह बात गवारा नहीं हो पा रही है वे समान दायित्व के सिद्धांत के तहत कार्बन क्रेडिट और प्रौद्योगिकी के नाम पर चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों के खजाने में धन डालें।

अगर इस सम्मेलन पर मंदी की छाया न होती तो शायद यह इतना विभाजित न होता। लेकिन बात इतनी सी नहीं है। बिना किसी विकल्प के 2012 में क्योटो संधि की मियाद को खत्म हो जाने देने से भी चिंता है। क्योटो संधि वास्तव में धरती की रक्षा के बहाने समता पर आधारित लोकतांत्रिक दुनिया का एक चार्टर है। उसमें विभिन्न देशों की जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए जो जिम्मेदारियां तय की गई हैं वह एक न्यायिक नजरिए पर आधारित हैं। वह वही नजरिया है जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र का चार्टर जाना जाता है।

लेकिन लगता है कि जी-8 के जी-20 बनने और महाशक्तियों के अलावा दूसरे देशों के उभरने के दावों के बावजूद अभी उस स्थिति को विकसित देशों ने स्वीकार नहीं किया है। वे अपनी श्रेष्ठता साबित करने और स्वार्थ को साधने के लिए कोई आधार ढूंढ़ते रहते हैं। पर क्योटो संधि दुनिया के राजनीतिक ढांचे के अलावा उत्पादन पद्धति में भी मूलभूत बदलाव का आह्वान करती है। लगता है दुनिया की वैसी समझ बनाने के लिए अभी और प्रयास किए जाने की जरूरत है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:क्योटो पर अटके