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युवा मन उलझता भी है भटकता भी है

फैशन, लाइफस्टाइल, करियर, एजुकेशन सभी में आज युवाओं की रफ्तार बला की है, लेकिन दिल इसलिए कांपता है कि उन्हें रफ्तार पर नियंत्रण और ब्रेक की भी कुछ खबर है कि नहीं। राजमार्गो पर युवाओं की फर्राटा भरती बाइक जो हादसे करा रही है, जीवन के तमाम क्षेत्रों में क्या-कुछ इनके मन-मस्तिष्क में नहीं हो रहा होता। ‘करना है, तो बस करना है’ की तर्ज पर जिंदगी जीने वाले युवाओं में विचारों का झंझावात इतना होता है कि वह फोकस नहीं हो पाते या असमंजस की स्थिति में पड़ जाते हैं।

माता-पिता की उम्मीदें
अकसर माता-पिता अपनी महत्वाकांक्षा का बोझ युवाओं पर डाल देते हैं जिससे वे भावनात्मक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं और यही बिखराव, उन्हें भ्रमित कर देता है। उन्हें ये समझ नहीं आता कि जिंदगी के विभिन्न कालचक्रों में कैसा रुख अख्तियार किया जाए। इसका दबाव उनके द्वारा करियर में लिए जाने वाले फैसलों में भी देखने को मिलता है। कैलाश अस्पताल में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. नसीमा नोमानी कहती हैं कि जब माता-पिता ही बच्चों के लक्ष्यों का निर्धारण करने लगते हैं तो बच्चे का असमंजस की स्थिति में पड़ना लाजिमी ही है। पेरेंट्स ये नहीं समझते कि उनके बच्चे की क्षमता कितनी है। वो अपने बच्चे को वही बनाने की कोशिश करते हैं, जो वो खुद चाहते हैं। बच्चा अगर क्लर्क की क्षमता का है तो वो उसे डॉक्टर बनाने की कोशिश करते हैं। इसका प्रभाव भविष्य में उनके करियर के  फैसलों पर पड़ता। आने वाले समय में बच्चे ये फैसला नहीं कर पाते कि उन्हें करना क्या है।

दोस्तों का दबाव
इस अवस्था में बच्चे सबसे ज्यादा अपने दोस्तों से प्रभावित होते हैं। फैसले लेते वक्त उनके जेहन में उनके दोस्त होते हैं। यहां तक कि करियर जैसे अहम फैसलों में भी दोस्तों का उन पर दबाव होता है। सर गंगाराम अस्पताल के मनोवैज्ञानिक विभाग के प्रमुख डॉ. जे. एम. वधावन कहते हैं कि आज के दौर में बच्चों की खुद को प्रदर्शित करने की भावना काफी बढ़ गई है। ऐसे में किसी मामले में वह खुद को पीछे नहीं रखना चाहते। चूंकि माता-पिता के बाद दोस्त भावनात्मक रूप से उनके काफी करीब होते हैं, लिहाजा उनके फैसलों पर दोस्तों की पसंद-नापसंद का असर पड़ता है।

संबंध
मनोवैज्ञानिक राजीव मेहता कहते हैं कि आज के दौर में तमाम युवा उनके पास ऐसे आते हैं जो अपने संबंधों को लेकर मानसिक रूप से काफी परेशान होते हैं। उनमें किसी का गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप होता है तो किसी को माँ-बाप की हर बात पर टोका-टाकी बर्दाश्त नहीं। ऐसे में उनके अंदर डिप्रेशन आ जाता है। वह सोचने लगते हैं कि क्या वह कठपुतली हैं और दूसरों की उम्मीदों पर खरे उतरने में नाकाम हैं। सर गंगाराम अस्पताल के मनो-विभाग प्रमुख डॉ. जे. एम. वधावन कहते हैं कि आज के दौर में पेरेंट्स और बच्चों की वैल्यू अलग-अलग हैं। दोनों के बीच विरोधाभास होता है। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स की भूमिका काफी बढ़ जाती है वह बच्चों की मन:स्थिति को समझों और उनसे दोस्त की भूमिका में पेश आए।

कैलाश अस्पताल की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. नसीमा नोमानी कहती हैं कि रिलेशनशिप के बारे में बच्चा घर से ही सीखता है। इसलिए बच्चा अगर शर्मीला है तो ऐसा उसने माता-पिता से ही सीखा है। और वहीं, संबंधों की प्रगाढ़ता घर के माहौल पर भी निर्भर करती है। माता-पिता रिश्तों के बारे में कितने संजीदा हैं, यह बच्चे पर प्रभाव डालता है।

करियर
करियर का चुनाव युवाओं के लिए एक बड़ी उलझन होती है। मनोवैज्ञानिक डॉ. राजीव मेहता कहते हैं कि मौजूदा समय में युवाओं में इंडीविजुअलटी बढ़ी है। ऐसे में करियर जैसे अहम फैसलों पर वह दखलंदाजी पसंद नहीं करते। वह कई बातों को नजरंदाज कर देते हैं या फिर माता-पिता की उम्मीदों के मुताबिक ही खुद को ढालने के प्रयास में अवसाद की स्थिति में आ जाते हैं।

सेक्स
वर्तमान में सेक्स अब एक ऐसा मुद्दा नहीं रह गया है जिस पर युवा बात नहीं करते। आज युवा सेक्स जैसी बातों को लेकर संजीदा है, लेकिन फिर भी इसको लेकर उनके मन में तमाम भ्रांतियां होती हैं या फिर यूं कहें कि उन्हें इसका समुचित ज्ञान नहीं होता। डॉ. राजीव मेहता कहते हैं कि उनकी सेक्स के बारे में जानकारी अस्पष्ट होती है। स्वप्नदोष, हस्तमैथुन, गर्भनिरोधकों, कांट्रासेप्टिव पिल जैसी बातों को लेकर कन्फ्यूज होते हैं। डॉ. मेहता के पास तमाम युवा सेक्स समस्याएं लेकर आते हैं। सेक्स को लेकर उनके मन में कई संशय होते हैं जो उनके मन-मस्तिष्क में इस तरह बस चुके होते हैं कि उन्हें लेकर वो डिप्रेस्ड हो जाते हैं। उन्हें उनकी इस मन:स्थिति से निकालना भी आसान नहीं होता।

थ्रिल
युवा जिंदगी में ‘थ्रिल’ तलाशते रहते हैं। इसी की वजह होती है वह एल्कोहल, तेज गाड़ी चलाना, कानून तोड़ना और आपराधिक घटनाओं में लिप्त हो जाते हैं। डॉ. वधावन कहते हैं कि युवा अपना वजूद तलाशने के लिए नशे को अपनाते हैं, उन्हें लगता है कि उनकी अपनी आइडेंटिटी के लिए ये जरूरी है। डॉ. मेहता के अनुसार जब युवा गाड़ी तेज चलाते हैं तो एक तरह से वह नकल कर रहे होते हैं। इसके अलावा, भारतीय युवाओं में एक प्रवृत्ति जो आम देखने को मिलती है वो है कानून तोड़ने की। कोई गुंडागर्दी से कानून तोड़ता है, वहीं पढ़े-लिखे शहरी युवा रेड लाइट जंप करने, गाड़ी को अनियंत्रित तरीके से चलाने में ही थ्रिल महसूस करते हैं। इसमें युवाओं का अति आत्मविश्वास झलकता है, उन्हें लगता है कि उनकी गाड़ी पर पूरी कमांड है।

परीक्षा
परीक्षा को लेकर युवाओं के मन में बेचैनी होती है। डॉ. मेहता मानते हैं कि परीक्षा को लेकर परेशान होने का सबसे बड़ा कारण परफॉर्मेस एन्ग्जाइटी होता है। वह परिणाम की चिंता ज्यादा करते हैं जिसकी वजह से वह परिश्रम को तवज्जो नहीं देते। 

मैं चाहें जो करूं , मेरी मर्जी
युवाओं में एक बात जो सबसे आम देखने में आती है, वो है खुद की चलाने की आदत।  डॉ. वधावन कहते हैं कि लाइफस्टाइल काफी बदल गया है। जो पेरेंट्स करते हैं वो उनके लिहाज से सही होता है और जो बच्चे करते हैं वो उनकी जेनरेशन पर सही बैठता है। ऐसे में दोनों के बीच विरोध स्वाभाविक है। दोनों को ही जेनरेशन गैप के फासले को समझना होगा। उन पर दबाव देकर बात न करें। 

ग्लैमर और फैशन
मौजूदा दौर में फैशन को लेकर माता-पिता और युवाओं में तनाव होता है खासकर लड़कियों के मामले में तो ऐसा होता ही है। डॉ. वधावन कहते हैं कि माता-पिता को बच्चों को तल्ख अंदाज के बजाए दोस्त की तरह समझाना होगा कि क्या सही है और क्या गलत।

युवाओं में तनाव के कुछ कारण
- अपने साथियों के साथ संबंध अच्छे न होना।
- टीचर से अपेक्षित सहयोग न मिलना
- परिजनों से संवाद की कमी।
- निजी जीवन में दूसरों का जरूरत से ज्यादा दखल।
- जरूरत से ज्यादा पढ़ाई या मनपसंद विषय का अभाव।
- पढ़ाई के अलावा घर के कामों का ज्यादा दबाव।
- खुद से जुड़ी परिस्थितियों पर नियंत्रण न होना।
- शिक्षालय सही न होना।
- अपनी योग्यता का उचित सम्मान न मिलना या पक्षपात का शिकार होना।
- अपनी शारीरिक सुंदरता और बौद्धिक क्षमता में कमी महसूस करना।

अपनी सोच पर नजर रखें
जिंदगी के प्रति आपका रवैया आपकी खुशियों को तय करता है। आस-पास चीजें आसानी से नहीं बदलतीं, पर खुद को बदला जा सकता है। बात पुरानी है पर सच है कि आपका कप आधा भरा है या खाली, यह आप ही तय कर सकते हैं। हो सकता है आप आदतन निराशावादी हों, पर कोशिश करने में क्या हर्ज है। निराशाओं के लिए तो अपने दरवाजे बंद रखिए ही, उन लोगों से भी दूर रहिए जिन्हें नकारात्मक होने में कमाल हासिल है। 

इसके अलावा :-
- बदलाव को जिंदगी का हिस्सा समझों।
- समस्याएं या तकलीफें बीत जाने वाली हैं और उनका हल निकाला जा सकता है।
- मानिए कि कोशिशें सफल होती हैं।
- रिश्तों की प्रतिबद्धता में यकीन रखें।
- दोस्तों या अपने करीबियों से अपने मन की बातें कहने से मुश्किलें कम होती है। उनकी मदद लेने में संकोच न करें।
-  खुद को मानसिक तौर पर मजबूत बनाएं।

ये हैं युवाओं के प्रमुख फोबिया

पब्लिक स्पीकिंग ग्लोसोफोबिया
अमूमन देखने में आता है कि किसी सभा, मंच पर जाते ही लोगों के कदम फ्रीज से हो जाते हैं, गला सूख जाता है, दिल कंपकपाने लगता है और आवाज में कंपन सा होने लगता है। स्टेज पर इतने लोगों के सामने बोलना उसके लिए एक उलझी गुत्थी की तरह होता है। ये फोबिया युवाओं में होने वाला सबसे आम फोबिया है। जीवन में हरेक व्यक्ति को किसी न किसी अवस्था में लोग इस फोबिया का शिकार हो जाते हैं। इससे निपटने के लिए आप पब्लिक स्पीकिंग कोर्स कर सकते हैं जो कि आपकी झिझक दूर करने में सहायक होते हैं।

सोशल फोबिया
अकसर युवाओं में देखने में आता है कि वह सामाजिक परिस्थितयों में शामिल होने के दौरान उन्हें काफी डर लगता है। इनमें सबसे प्रमुख है सड़क पर चलना, बैठकों में शामिल होना, कतार में खड़े होना आदि। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इसका सबसे प्रमुख कारण है मौजूदा दौर में न्यूक्लियर फैमिली है, ऐसे में युवा सामाजिक रूप से लोगों से मिलने-जुलने से कट से गए है। वो अकेले रहना पसंद करते हैं या फिर अपने अभिन्न दोस्तों के साथ।

ट्राइपाएनोफोबिया
अकसर लोग डॉक्टर से मिलने में इसलिए परहेज करते हैं क्योंकि कहीं वह उन्हें इंजेक्शन लगाने की सलाह न दें। खून दान करने या एक्यूंपचर से दर्द होने के ख्याल से आप भयभीत हो जाते हैं। इससे निपटने का बेहतर तरीका ये है कि आपको जब भी इंजेक्शन लगाया जाए आप अपना ध्यान इंजेक्शन पर न लगाकर कहीं और लगाएं या फिर अपनी आंखों को बंद कर लें।

सिंपल फोबिया
पशु-पक्षियों से डर, कीड़ों से डर, कुछ ऑब्जेक्ट जैसे कि बटन, टेलीफोन, ब्रिज आदि से डर। इसके अलावा मितली होने का डर, किसी गंध के प्रति संवेदनशील होने का डर या किसी शरीर के प्रति डर।

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