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परिवेश और हम

इस धरती पर ऐसे बहुत से लोगों ने जन्म लिया, पीड़ित मानवता के दुखों का वर्णन करते-करते जिनकी आँखें आँसुओं से भीग गईं। लेकिन उसके बाद उन लोगों ने बड़े आराम से बैठकर मांस और मछली की रसदार और स्वादिष्ट सब्जी खाई, मानो सब्जी के लिए कटते समय उन मछलियों को कोई कष्ट नहीं पहुँचा हो? अर्थात इस मानवतावाद ने मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी जीव की चिन्ता नहीं की। अन्य जीव-जन्तुओं को कष्ट पहुँचाना, मानवतावाद के प्रवर्तकों को कोई अन्यायपूर्ण कार्य नहीं लगा। मनुष्य को समझ-बूझकर चलना होगा। 

अपने अस्तित्व की रक्षा करते समय, अपने परिवेश को भी बचाना होगा। मनुष्य के भीतर प्राणों का जो छन्दमय स्पन्दन है, वही मनुष्य को मानवतावाद की ओर आकर्षित करता है। इसी सत्ताबोध को यदि समग्र ब्रह्माण्ड में फैला दिया जाये, तभी मनुष्य के रूप में हमारा अस्तित्व पूरी तरह सार्थक होगा। अपने आन्तरिक प्रेम को समस्त जीव जगत में फैलाने की यह जो भावना है, इसके पीछे एक विराट सत्ता की उपस्थिति को भी स्वीकार करना होगा। भक्ति मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ सम्पदा है।

समस्त अणु, परमाणु, इलेक्ट्रान, न्यूट्रान, पजिट्रान इत्यादि यथार्थ में एकमात्र विष्णु की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। जो इस तथ्य को अच्छी तरह समझकर, इस अनुभूति को अपने हृदय में हमेशा संजोकर रखे रहते हैं, उन्हीं का अस्तित्व सार्थक है। वही सच्चे भक्त हैं। उनके जीवन में भक्ति केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं रहती बल्कि साधना के स्तर से ऊपर उठकर उनके प्राणों का प्राण बन जाती है और अन्तत: भक्ति तत्व को पूरे विश्व में फैलाना उनके जीवन का उद्देश्य हो जाता है। इस तथ्य को केन्द्रित कर मानवतावाद की भावना को जब सम्पूर्ण चर-अचर जगत में फैला दिया जाता है उसी भावना का नाम मैंने नव मानवतावाद रखा है। यह नव-मानवतावाद लोगों को मानवतावाद के धरातल से ऊपर उठाकर उन्हें विश्व एकतावाद में स्थापित कर समस्त जीव जगत को अपना समझकर उनसे प्रेम करना सिखायेगा।

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