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विदेश नीति : प्रधानमंत्री ने रचा नया इतिहास

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमेरिका दौरे के बारे में अनेक बेसिर पैर की टिप्पणियां की जा रही हैं। कहा जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने मीठी बातें कीं, खाना खिलाया पर नतीजा कुछ नहीं निकला। सच यह है कि प्रधानमंत्री के अमेरिका दौरे से सारी भ्रांतियां समाप्त हो गई और आज की तारीख में भारत और अमेरिका के संबंध जितने मजबूत और मधुर हैं उतने पहले कभी नहीं थे।

भारत का यह दुर्भाग्य था कि पूरे शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका भारत का कट्टर विरोधी रहा। वह पंडित नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति की खिल्ली उड़ाता था और सरेआम यह कहता था कि भारत सोवियत रूस का पिछलग्गू है। भारत को नीचा दिखाने के लिये उसने पाकिस्तान को हमेशा भारी सैनिक और आर्थिक मदद दी। 1954 में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति आयज़न हावर ने पाकिस्तान को भारी सैनिक सहायता देने की घोषणा की थी तो पंडित नेहरू ने इसका घोर विरोध करते हुए संसद में कहा था कि अमेरिका का यह सोचना गलत है कि यह सैन्य सहायता पाकिस्तान चीन के विरुद्ध इस्तेमाल करेगा। 1965 तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध ने यह साबित कर दिया कि पंडित नेहरू की भविष्यवाणी सही थी।

पूरे शीतयुद्ध के दौरान केवल राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के शासनकाल में अमेरिका और भारत के संबंध सामान्य हुए थे। कैनेडी भारत को अच्छी तरह समझने लगे थे। यदि वे कुछ और साल जीवित रहते तो दोनों देशों के संबंध अत्यन्त ही मधुर हो जाते। भारत और अमेरिका के संबंधों में एक बार गरमाहट फिर से तब आई जब स्वर्गीय राजीव गांधी ने अमेरिका का दौरा किया था, परन्तु पाकिस्तान से अमेरिका का मोह कभी हटा नहीं। पाकिस्तान में लोकतंत्र बहुत कम समय के लिये रहा। वहां सदैव सेना का ही वर्चस्व रहा। इस बीच अमेरिका ने जो समय-समय पर पाकिस्तान को अरबों डालर की मदद दी थी उसे वहां के सैनिक शासक और उनके चहते अफसर डकार गये। आम जनता को कुछ नहीं मिला।

जब सोवियत फौज अफगानिस्तान में घुस गई तब उसे वहां से भगाने के लिये अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद ली। अफगानिस्तान से भागकर जो लड़ाकू सैनिक और असैनिक पाकिस्तान आए थे वे मुजाहिदीन कहलाए। बाद में वे ही तालिबान कहलाने लगे। उन्हें अमेरिका ने पाकिस्तान में गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी और आधुनिकतम हथियार दिया। इस बीच सोवियत यूनियन की आर्थिक हालत खराब हो गई और गोर्बाचोव ने पूर्वी यूरोप के सभी देशों को आजाद कर दिया तथा अफगानिस्तान से सोवियत फौज हटा ली। जो अफगानी और पाकिस्तानी छापामार अफगानिस्तान में लड़ रहे थे और जिन्हें तालिबान कहा जाता था उन्हीं के हाथों अमेरिका ने अफगानिस्तान की सत्ता सौंप दी और वह अफगानिस्तान से निकल गया।

इन तालिबानों ने केवल अफगानिस्तान में ही कहर नहीं मचाया बल्कि सन् 2001 में 9/11 को अमेरिका पर भी आतंकी हमला कर दिया। अब तालिबान और दूसरे आतंकवादी फिर से संगठित हो गये और वे अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में कहर मचा रहे हैं। भारत को भी इन आतंकवादियों से खतरा है।

भारत-अमेरिकी संबंधों को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिये। पिछले कुछ महीनों में भारत में यह कहा जा रहा था कि पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन और बुश के समय में भारत को जो महत्व दिया जा रहा था वैसा महत्व राष्ट्रपति ओबामा ने नहीं दिया। परन्तु जिस तरह से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का व्हाइट हाऊस में स्वागत हुआ उससे एक बात तो स्पष्ट हो गई कि अमेरिका अभी भी भारत को अपना निकटतम मित्र समझता है। भारत में लोगों को यह शिकायत थी कि ओबामा सरकार पाकिस्तान पर वहां के आतंकवादियों को नियंत्रित करने के लिये पूरा दबाव नहीं दे रही है। हाल में ओबामा ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी को तीखी भाषा में चेतावनी देते हुए कहा कि वह लश्करे-तैयबा जैसे आतंकवादियों को इस्तेमाल करने की नीति छोड़े।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति ओबामा को दो टूक कह दिया कि हाल में भारत चीन की सीमा के मामले में चीन का रवैया मित्रवत नहीं है। ओबामा को अपने गुप्तचरों से भी सारी स्थिति की जानकारी है। यह बड़े संतोष की बात है कि ओबामा ने भारत को एक परमाणु संपन्न देश स्वीकार किया और सार्वजनिक तौर से यह कहा कि अमेरिका और भारत की मित्रता सारे संसार की शांति और सुरक्षा के लिये आवश्यक है। यह तो मानना ही होगा कि चीन और पाकिस्तान की दोस्ती दिनोंदिन गहरी होती जा रही है और दोनों देश भारत के कट्टर दुश्मन हैं। समय आ गया है जब हम प्रधानमंत्री के प्रयासों की सराहना करें।
  
लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं

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