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दो टूक (सोमवार, 14 दिसंबर 2009)

‘न्याय सिर्फ पैसेवाले ही खरीद सकते हैं।’ रोजमर्रा अनुभवों से पैदा होने वाली इस टिप्पणी को हम अकसर सुनते हैं। यह भी छुपा नहीं है कि कई बार अपराधी पैसे के बल पर बड़े से बड़ा गुनाह कर बरी हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि पैसे वालों में यह धारणा जड़ जमा चुकी है कि अपनी ताकत से वह न्याय व्यवस्था को भी खरीद सकते हैं। वरना दिल्ली हाईकोर्ट को उन पर तीखी टिप्पणी करने की जरूरत नहीं पड़ती। माइक्रोसॉफ्ट ने सिर्फ प्रतिवादियों को परेशान करने के लिए दूरदराज शहरों के मामले दिल्ली की अदालत में दायर कर डाले। इस मामले में अदालत के निर्देश न सिर्फ धनमद में चूर लोगों को चेताने वाले हैं बल्कि न्याय व्यवस्था की साख को भी मजबूत
करते हैं।

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