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महंगाई और फीस का भार

एक तरफ तो हम शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने की बात करते हैं, दूसरी तरफ निजी शिक्षा संस्थान मनमाने ढंग से बच्चों की फीस बढ़ा रहे हैं। पहले ही महंगाई के चलते लोगों के लिए अपनी रोटी दाल का खर्च निकालना मुश्किल हो रहा है, उस पर से महंगी शिक्षा अभिभावकों को परेशान कर रही है। निजी शिक्षा संस्थानों को न लोगों की परेशानियों का ख्याल है और न ही वे बच्चों के भविष्य की कोई चिंता करते हैं। उनका अभिभावकों से व्यवहार तक बहुत खराब है।
अनुराग वर्मा, गाजियाबाद

ऊर्जा सघनता का सच
भारत सरकार ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न में कटौती का लक्ष्य निर्धारित करने से इनकार कर दिया है, अलबत्ता ऊर्जा सघनता में कमी करने का लक्ष्य तय किया है। दूसरे कई देशों ने भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न के बजाय ऊर्जा सघनता कम करने का एलान किया है। यह महज आंकड़ों का खेल है, दरअसल प्रदूषण जारी रखने का दूसरा नाम ऊर्जा सघनता है।
आर.के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

इन्हें भी आरक्षण क्यों
अब अल्पसंख्यकों को भी आरक्षण देने के बात होने लगी है। उन्हें 15 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा गया है। अगर यह प्रस्ताव पास हुआ तो जल्द ही एक नया पिछड़ा वर्ग जन्म ले लेगा।
वंदना शर्मा, गौतम विहार, दिल्ली

कब होगा समाधान
क्या हम अयोध्या मसले पर आंदोलन ही करते रहेंगे या फिर इस विवाद को सुलझाने की कोशिश भी करेंगे? छह दिसंबर को कोई काला दिवस मनाता है तो कोई शौर्य दिवस। क्या हमारे दलों में इतनी भी राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं है कि वे इस मसले का कोई सौहार्दपूर्ण समाधान जल्द से जल्द खोज लें ताकि समाज में सांप्रदायिक तनाव और वैमनस्य खत्म हो सके।
मनीष कुमार चौधरी, लक्ष्मी नगर, दिल्ली

न्यूनतम मजदूरी बढ़ाएं
सारी दुनिया रोटी के लिए भाग रही है, लेकिन महंगाई के कारण यह रोटी सबके नसीब से दूर भाग रही है। गरीब आदमी हर रोज रोता है। उसकी हर रोज की आमदनी सौ रुपये भी नहीं है, जबकि परिवार का खर्च तीन सौ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें गुजारा हो तो कैसे? इसलिए जरूरी है कि न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जाए। सरकार को न्यूनतम वेतन 700 रुपये प्रतिदिन देने के लिए कदम उठाने चाहिए। वर्ना दूसरा तरीका यह है कि सरकार गरीबों को सस्ता सामान उपलब्ध कराए।
कैलाश चंद्र ‘बंगसर’, कठपुड़िया, अल्मोड़ा

जनता पर भी ध्यान दें नेता
कहने को तो देश में लोकतंत्र है, किन्तु वास्तव में है नहीं, क्योंकि नेता लोग तो बड़े ठाठ से रह रहे हैं और निरीह जनता महंगाई तथा बेरोजगारी जैसी समस्याओं से परेशान है। कृषि प्रधान देश का अन्नदाता किसान स्वयं आत्महत्या करने को मजबूर है। नेताओं का राजसी रहन-सहन, आलीशान कोठियाँ, बढ़िया खान-पान और विदेशी बैंकों में अकूत धन होना क्या दर्शाता है? लाचार बेचारी जनता खून-पसीना बहाने के बावजूद कमरतोड़ महँगाई से त्रस्त है, अत: मेरा अनुनय है नेता जनता पर भी ध्यान दें।
अरविंद कुमार, दिल्ली

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