class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

दर्शकों से दूर होता दूरदर्शन

खबर किसी राष्ट्रीय अखबार में जगह नहीं पा सकी इसलिए चर्चा नहीं हुई। किसी क्षेत्रीय अखबार में छपी खबर दिल्ली के लिए अहम होती ही कहां हैं, भले ही वह अखबार अंग्रेजी का ही क्यों न हो। पिछले दिनों असम के अखबार सेंटिनल से पता चला कि सिल्चर का दूरदर्शन केन्द्र बंद होने जा रहा है। वजह है- कार्यक्रमों के लगातार घटते स्तर की वजह से दर्शकों में बेहद कमी का रिकार्ड बन जाना। कहा गया था कि यहां पर दूरदर्शन केन्द्र में काम करने वाले मिलते ही नहीं। फिलहाल स्थिति यह है कि कार्यक्रम रिपीट होते रहते हैं, उनमें विविधता की कमी साफ दिखने लगी है और यहां तक कि हफ्ते में एक बार प्रसारित होने वाला बांग्ला बुलेटिन भी बासी खबरों का फटा गुलदस्ता बनने लगा है। यही वजह है कि अब तक दूरदर्शन पर निर्भर रहने वाले सुदूर इलाकों के लोगों ने भी दूरदर्शन को देखना तकरीबन बंद कर दिया है। ऐसे में सरकार को शायद आसान यही लग रहा होगा कि इस सफेद हाथी को अब अतीत बनाने में ही भलाई है।

अक्सर ही यह कहा जाता है कि दूरदर्शन जैसा जनहित संगठन पूरी दुनिया में कोई दूसरा नहीं है। यह भी सच है कि जनता के वे तमाम जमीनी मुद्दे जो ईलीट क्लास के निजी चैनलों को समझ भी नहीं आते, दूरदर्शन मजे से निभाता है। लेकिन किस कीमत पर। कैसी गुणवत्ता के साथ? असल में अपने वर्चस्व की शहंशाही के दौर में ही उसे जिस चोटी पर पहुंचना चाहिए था, उसमें वह चूक गया। उस दौर में भले ही उसने हम लोगों को रामायण, महाभारत दिखाकर इतिहास रचा लेकिन इन्हें बनाया खुद नहीं।

ये निजी हाथों से बन कर आए। बाद में नए चैनल आए तो उन्होंने हर रोज दूरदर्शन को पटखनी दी और दूरदर्शन की ही मलाई खाकर कइयों ने अपने चैनल खोल लिए। यही लोग अब कहते हैं कि हम दूरदर्शन जैसे नहीं, हम स्मार्ट हैं, हम लोकप्रिय भी हैं। यह ठीक है कि दूरदर्शन की नितांत नीरस खबरों में आज भी थोड़ी बहुत विश्वसनीयता नहीं है। हाल यह है कि देश के प्रधानमंत्री की हत्या हो जाती है और उसके बेटे को खबर सुनने के लिए बीबीसी का सहारा लेना पड़ता है। इंदिरा गांधी की हत्या वाले उस दौर से आज तक बदला सिर्फ यह है कि इसकी खबरों के दर्शक लगातार कम हुए हैं।

मौजूदा समय में डीडी न्यूज ने मेकओवर की कई कोशिशें की गईं, लेकिन सफेद हाथी को कमाऊ हाथी बनाना कोई आसान काम नहीं। यहां की नियुक्तियां मंत्रालय के बड़े दरवाजे की मेहरबानी पर काफी हद तक टिकी होती हैं। बाहर के टूर पर जाने का वरदान किसे मिलना है, यह भी आमतौर पर मेरिट नहीं, मंत्रालय का आशीर्वाद या उनका नियुक्त सिपाही तय करता है। खबरों का चुनाव आज भी पूरी तरह से मेरिट पर नहीं होता। अपने सरकारी ड्रामे के चलते जिस दूरदर्शन ने जय प्रकाश नारायण की महान सफल रैली को ही पूरी तरह फ्लाप बता दिया था, उस पर खबरों के मामले में इतनी जल्दी विश्वास की पटरी बिछाई भी नहीं जा सकती।
अब लौटते हैं सिल्चर पर। सिल्चर के दूरदर्शन केंद्र को बंद करने पर राजनीति शुरू हो गई है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य प्रदीप दत्ता राय इस बारे में सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी को एक मेमोरेंडम भेज चुके हैं।
इसके अलावा पूर्व केन्द्रीय मंत्री संतोष मोहन देव और कैबिनेट मंत्री गौतम राय भी इस बारे में चिंता जता चुके हैं, लेकिन अभी तक कुछ ठोस होने की कोई खबर नहीं है। इस साल अगस्त में ही संसद में अंबिका सोनी ने खुद स्वीकार किया था कि पिछले तीन साल के दौरान दूरदर्शन की सालाना आय इसके सालाना व्यय की तुलना में कम रही है। दूरदर्शन फ्री टू एयर डीटीएच सेवा के अलावा 31 टीवी चैनलों को प्रसारित कर रहा है। 2008-09 में दूरदर्शन की 737.05 करोड़ रुपये और उसका व्यय 1356.86 करोड़ रुपये रहा। लगता है कि क्रिकेट के अलावा दूरदर्शन के पास अब कमाई का कोई बड़ा जरिया नहीं रह गया है। क्रिकेट भी इसलिए कि अगर देश में मैच हो रहा हो तो दूरदर्शन को फीड देना आयोजकों की मजबूरी है।

मतलब यह कि आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया। इसमें अकेले सिल्चर दूरदर्शन का भला क्या दोष, लेकिन किसी को तो पहला शिकार बनना ही था, सिल्चर बन गया है बाकी का नंबर इसके बाद आएगा। इसे लेकर बड़ी बड़ी आवाजें भी उठेंगी। ज्ञापन, आंदोलन, धरने, प्रदर्शन का दौर भी चल सकता है, लेकिन दर्शकों पर ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है, वे तो पहले ही इससे दूर होते जा रहे हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:दर्शकों से दूर होता दूरदर्शन