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पासपोर्ट कारोबार से तेलंगाना के अलंबरदार

इतिहास के. चंद्रशेखर राव को पृथक तेलंगाना राज्य की स्थापना का नायक कहेगा या फिर आंध्र प्रदेश के विभाजन का खलनायक? तेलंगाना की सीमाएं छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों से छूती हैं। इसके दस जिले आदिवासी बहुल हैं और अत्यंत पिछड़े हैं। इसी पिछड़ेपन के चलते नक्सलवादी यहां अपनी जड़ें गहरे तक जमा चुके हैं। 1954 में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग के समय से ही यह मांग चली आ रही है। 1969 में चेन्ना रेड्डी के नेतृत्व में मुल्की रूल आंदोलन ने अलग तेलंगाना राज्य की मांग को काफी ऊंचाई तक पहुंचाया था। इसके बाद भी कई बार तेलंगाना के लिये जोर-आजमाइशें हुईं।

लेकिन यह बात अपने में दिलचस्प है कि चंद्रशेखर राव के दिमाग में पृथक तेलंगाना के लिये कभी भी कोई गंभीर सोच नहीं रही। राजनीति में पराजय और उनकी महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें तेलंगाना का कार्ड खेलने को विवश किया। 17 फरवरी 1954 में मेदक जिले के सिद्दीपेट में जन्मे चंद्रशेखर राव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की। तेलुगू में एमए करने के बाद मुख्यधारा की राजनीति में आने से पहले उन्होंने खाड़ी देशों में नौजवानों को भेजने का कारोबार किया। वे उनके पासपोर्ट बनवाते और वीजा लगवाते।
1984 में  आंध्र प्रदेश में तेलुगू फिल्म स्टार एनटी रामाराव जब राजनीति का समाजशास्त्र बदलने के अभियान में लगे थे तभी चंद्रशेखर राव ने राजनीति की मुख्यधारा में प्रवेश किया। उस वक्त उनकी उम्र 31 साल थी। रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू जब 1999 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो चंद्रशेखर राव का राजनीतिक संकट बढ़ गया। वे चंद्रबाबू नायडू मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन नायडृ ने उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया। इससे नाराज चंद्रशेखर राव ने पार्टी छोड़ दी और उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति बना ली। इसी दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष वाईएस रेड्डी के साथ गठजोड़ कर 2004 का चुनाव लड़ा। इस गठजोड़ में पृथक तेलंगाना का मुद्दा शामिल था। चुनाव में इस गठबंधन को सफलता मिली। रेड्डी राज्य के मुख्यमंत्री बने और चंद्रशेखर राव केन्द्रीय कैबिनेट में शामिल हो गये। रेड्डी ने अपनी कूटनीति के तहत तेलंगाना के सवाल को जमींदोज कर दिया। दो साल बाद चंद्रशेखर राव को एक बार फिर तेलंगाना की याद आई और उन्होंने अपने सांसदों के साथ संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और रेड्डी मंत्रिमंडल में शामिल अपने सभी विधायकों को वापस बुला लिया।

इसके बाद रेड्डी ने तेलंगाना राष्ट्र समिति को तोड़ने की कोशिश की और चंद्रशेखर राव और उनके विधायकों के खिलाफ अवैध मानव तस्करी के आरोप लगवाये। नतीजतन जनता का चंद्रशेखर राव की पार्टी से विश्वास उठने लगा। 2009 के लोकसभा चुनाव में वामपंथियों और तेलुगू देशम के साथ मिल कर चंद्रशेखर राव ने चुनाव लड़ा।
चुनाव के दौरान सिकन्दराबाद से तेलंगाना राष्ट्र समिति के उम्मीदवार ने सार्वजनिक तौर पर चंद्रशेखर राव पर आरोप लगाया कि उन्होंने दस करोड़ रुपये देकर पार्टी का टिकट खरीदा है। इसका चंद्रशेखर राव के पूरे चुनाव में असर पड़ा। भारी नुकसान हुआ। वाईएसआर रेड्डी की मौत के बाद चंद्रशेखर राव ने पहल शुरू की। इस बार फिर उन्होंने तेलंगाना का कार्ड खेला। वे आमरण अनशन पर बैठ गये। उनके नजदीकियों का कहना है कि उन्हें नहीं पता था कि कांग्रेस पृथक तेलंगाना की मांग मान लेगी और वे हीरो बन जायेंगे।   
                

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