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बीना राय के निधन पर विशेष

बीना राय के निधन पर विशेष

पचास के दशक में ‘अनारकली’ से मशहूर हुई अभिनेत्री बीना राय आज हमारे बीच नहीं हैं। पिछले दिनों उनका निधन हो गया। बीना राय का नाम उन अभिनेत्रियों में शामिल किया जाता है, जिन्होंने अपने छोटे से फिल्मी करियर में इंडस्ट्री में अपने सौंदर्य और अभिनय के बल पर लाखों दिलों पर राज किया। फिल्मों में बीना राय के सफरनामे पर एक यादगार लम्हा राजेन्द्र काण्डपाल की कलम से यह पचास के दशक में लखनऊ की बात है। उस समय मीडिया में आज की तरह फिल्मी सितारों के प्रति उतना क्रेज नहीं था। इसके बावजूद फिल्मों का जादू छोटे से कस्बेनुमा लखनऊ  के बाशिंदों के सिर पर चढ़ कर बोला करता था। उस समय भी युवक-युवतियों में खासतौर पर माडर्न कॉलेजों के लड़के-लड़कियों में फिल्मों में काम करने की ललक थी। लखनऊ  का एक ऐसा ही कॉलेज है इजाबेला थॉबर्न कॉलेज। इस कॉलेज में कृष्णा नाम की एक हसीन लड़की पढ़ती थी। उस पर और उसकी सहेलियों आशा माथुर और इन्दिरा पांचाल पर हीरोइन बनने का भूत सवार था। कृष्णा कॉलेज के नाटकों में काम किया करती थी। कहते हैं कि एक विज्ञापन देख कर कृष्णा और उसकी तीनों सहेलियों ने एक फिल्म कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया था, जिसके बाद वह अभिनेत्री बनीं। पर कुछ का कहना है कि तत्कालीन फिल्म निर्माता-निर्देशक और अभिनेता किशोर साहू ने कृष्णा को एक नाटक में देखा था। वह उससे प्रभावित हुए और दोनों सहेलियों के साथ उन्हें मुम्बई लेकर चले आये। किशोर साहू ने कृष्णा को बीना राय नाम दिया। बीना राय की बतौर हीरोइन पहली फिल्म ‘काली घटा’ थी। यह फिल्म 1951 में प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के नायक और निर्देशक खुद किशोर  साहू थे। फिल्म नहीं चली।  अलबत्ता, अपने गजब के हुस्न के कारण बीना राय का जादू मुम्बइया फिल्म निर्माताओं के सिर चढ़ कर बोलने लगा। फिल्मों में बीना राय का करियर बहुत लम्बा नहीं रहा। अपने 15 साल के करियर में उन्होंने कोई 19 फिल्में कीं। इन सभी में तत्कालीन बड़े अभिनेता उनके नायक थे। उन्होंने अशोक कुमार के साथ शोले, सरदार, तलाश, बन्दी और दादी मां, भारत भूषण के साथ मेरा सलाम, अजित के साथ मरीन ड्राइव, दिलीप कुमार और देव आनंद के  साथ ‘इंसानियत’ और प्रेमनाथ के साथ शगुफ्ता, औरत, प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा, हमारा वतन, समंदर और चगेंज खान सरीखी फिल्में कीं। प्रेमनाथ के साथ उनकी कोई भी फिल्म हिट नहीं हो सकी। फिल्मों में उनकी सबसे सफल जोड़ी प्रदीप कुमार के साथ बनी, जो अपनी ऐतिहासिक फिल्मों में भूमिका  के कारण प्रिंस अभिनेता के रूप में मशहूर थे। बीना राय की प्रदीप कुमार के साथ हिट फिल्मों में अनारकली, ताजमहल और घूंघट जैसी फिल्में थीं। ‘घूंघट’ के लिए बीना राय को फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला।

बीना राय के अनारकली बनने की कहानी भी दिलचस्प है। उन दिनों के. आसिफ ने ‘मुगल-ए-आजम’ की जोर-शोर से शुरुआत की थी, पर किसी न किसी कारण से शूटिंग टलती जा रही थी। ऐसे समय में एक छोटे फिल्मकार नन्दलाल जसवंत लाल सामने आये। उन्होंने सलीम अनारकली की कहानी को लेकर ‘अनारकली’ का निर्माण शुरू किया। इस फिल्म के सलीम प्रदीप कुमार थे तथा उनकी अनारकली बीना राय बनी थीं। इस श्वेत-श्याम फिल्म ने धूम मचा दी थी। खासतौर पर इस फिल्म में सी. रामचन्द्र का संगीत जबर्दस्त हिट हुआ था। बीना रॉय पर फिल्माया गया मोहब्बत में ऐसे कदम लड़खड़ाए जमाने ने समझा हम पी के आये.. का जादू आम संगीत प्रेमियों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। नशे में झूमती अनारकली के रूप में बीना राय की अदाकारी दिलकश और गजब की थी। लोग इस एक गीत के लिए अनारकली को देखने बार-बार गये। उस समय बीना राय के माथे पर बालों की एक घूमती लट के साथ पोस्टर काफी मशहूर हुआ था। उनकी एक अन्य ऐतिहासिक फिल्म ‘ताजमहल’ 1963 में रिलीज हुई थी।
इस फिल्म में बीना राय मुमताज महल की भूमिका में थीं। कहते हैं कि जब मधुबाला के दिलीप कुमार से संबंध टूट गये, तब मधुबाला के दीवाने प्रेमनाथ ने मधुबाला के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। मधुबाला ने उसे स्वीकार भी कर लिया था, मगर पता नहीं क्या बात हुई कि प्रेमनाथ ने अपनी फिल्म ‘औरत’ की नायिका बीना राय से शादी कर ली। बीना राय और मधुबाला का अंतिम मुकाबला 1960 में हुआ, जब बीना राय को ‘घूंघट’ और मधुबाला को ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की श्रेणी में नामित किया गया। उम्मीद की जा रही थी कि मधुबाला यह पुरस्कार जीतेंगी, पर अंतत: यह पुरस्कार बीना राय को ‘घूंघट’ में अपनी पारिवारिक भूमिका के लिए मिला। कम लोग जानते होंगे कि बीना राय को ‘नागिन’ और ‘देवदास’ के प्रस्ताव भी मिले थे, मगर बीना राय ने दोनों बड़े प्रस्ताव ठुकरा दिये। बाद में ये दोनों भूमिकाएं वैजयंतीमाला को मिल गयीं। सभी जानते हैं कि ‘नागिन’ और ‘देवदास’ ने वैजयंतीमाला को टॉप पर पहुंचा दिया था।

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