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..चलो सर्दियों के धाम

..चलो सर्दियों के धाम

मौसम चाहे जो हो, तीर्थ यात्राओं का दौर कभी नहीं थमता। भाग-दौड़ भरी जिंदगी में समय मिलते ही इंसान तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ता है, लेकिन कुछ तीर्थ यात्राएं ऐसी हैं, जो मौसम से बंधी हैं। उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा भी ऐसी है। बद्री-केदार यात्रा और गंगोत्री-यमुनोत्री यात्राएं वर्ष में लगभग छ: माह ही संभव होती हैं। ये चारों तीर्थ पर्वतों पर इतनी ऊंचाई पर स्थित हैं, जहां सर्दी का मौसम शुरू होते ही हिमपात होने लगता है। पवित्र देवालय बर्फ की सफेद चादर से ढक जाते हैं और वहां पहुंचना संभव नहीं रहता। लेकिन ईश आराधना कभी नहीं थमती। यही कारण है कि सदियों से इन देवालयों के साथ एक परंपरा जुड़ी हुई है। शीत ऋतु में जब इन मंदिरों के कपाट बंद हो जाते हैं तो भगवान के विग्रह को ऐसे स्थानों पर ले आया जाता है, जहां सरलता से पूजा-अर्चना की जा सके। जो लोग ग्रीष्म ऋतु में दर्शन नहीं कर पाते, वे सर्दियों में समय मिलने पर इन स्थानों पर पहुंच इष्टदेवों की पूजा करते हैं। भगवान का मूल विग्रह तो स्थायी रूप से मुख्य मंदिर में ही अवस्थित रहता है, किन्तु प्रतीक रूप में स्थापित की गई चल प्रतिमा को बड़े ही पारंपरिक ढंग से पालकी में विराजित करके इन देवालयों की ओर प्रस्थान किया जाता है। इसीलिए इन देवालयों को सर्दियों के चार धाम कहा जाने लगा है।

गंगोत्री-मुखवा
सर्वप्रथम गंगोत्री धाम के पट बंद होते हैं। समुद्रतल से करीब 10,500 फुट की उंचाई पर स्थित गंगोत्री धाम देव सरिता गंगा को समर्पित है। यहां गंगा को देवी मां के समान पूजा जाता है। मंदिर में गंगा मैया की पावन प्रतिमा स्थापित है। अक्टूबर माह तक इस स्थान पर हिमपात होने लगता है। परंपरा के अनुसार, गंगोत्री के पट दीपावली के अगले दिन बंद होते हैं। उस दिन गंगा मां की प्रतिमा को एक डोली में सजा कर रीति-रिवाज व धार्मिक अनुष्ठान के साथ मंदिर के पुजारी, मंदिर कमेटी के अधिकारी एवं सैकड़ों श्रद्धालु यहां से प्रस्थान करते हैं। उस समय यह भी कहा जाता है कि गंगा मां अपने मायके जा रही हैं। यह यात्रा एक उत्सव के समान होती है, जिसका समापन मुखवा गांव में होता है। यहां के मार्कण्डेय मंदिर में एक रात पूजा-अर्चना के बाद भैयादूज के दिन मां गंगा की मूर्ति को गर्भगृह में स्थापित करने के बाद कपाट बंद होने तक छह माह की पूजा विधि-विधान से होती है। इस दौरान मुखवा गांव के लोग गंगा को बेटी की तर्ज पर पूजते हैं। तीज-त्योहार पर गंगा के मंदिर में विशेष उत्सव का आयोजन होता है। मुखवा के अलावा धराली, हर्सिल, पुराली, सुकी, झाला व जसपुर गांव के लोग भी दर्शन को पहुंचते हैं। इन दिनों स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश के लोग भी गंगा के दर्शन को पहुंच रहे हैं। गंगा के तीर्थपुरोहित मुखवा गांव के सेमवाल लोग हैं, जो बारी-बारी से गंगा की पूजा में जुटे रहते हैं। श्री पांच गंगोत्री मंदिर समिति भी छह माह तक शीतकाल निवास के लिए सभी जिम्मेदारी निभाती है। मुखवा एक छोटा-सा गांव है। यह उत्तरकाशी से करीब 70 कि़मी़ दूर, हर्सिल के निकट स्थित है। इस स्थान पर स्थित गंगा मंदिर गंगोत्री मंदिर जितना विशाल नहीं है। चार धाम विकास परिषद के अध्यक्ष सूरतराम नौटियाल कहते हैं कि गंगोत्री मां के दर्शन जो लोग गंगोत्री में नहीं कर सकते, वे मुखवा में आकर भगवती के दर्शन करते हैं। मुखवा जाने का मार्ग बहुत सुंदर है। तीर्थ यात्राी उत्तरकाशी को आधार बना कर मुखवा गांव जा सकते हैं। उत्तरकाशी अपने आप में भी एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। वहां भगवान विश्वनाथ का मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय है।

यमुनोत्री-खरसाली
यमुनोत्री धाम यमुना नदी के दैवीय स्वरूप को समर्पित है। इस पावन धाम के कपाट यम द्वितीया यानी भैया दूज पर बंद होते हैं। उस दिन वैदिक रीति और पूरे मंत्रोच्चार के साथ  शनि देव की मौजूदगी में यमुना मैया के विग्रह को उत्सव डोली में सजा कर खरसाली गांव ले जाया जाता है। क्षेत्रीय संस्कृति व सदियों से चली आ रही व्यवस्था के तहत यमुना की मूर्ति को खरसाली में बने प्राचीन शनि मंदिर में छह माह तक रखा जाता है। यमुनोत्री से खरसाली तक डोली यात्रा में यमुनाघाटी के अलावा देश-विदेश से पहुंचने वाले हजारों लोग शामिल होते हैं। इन दिनों यमुना की पूजा नित्य भोग के साथ खरसाली में हो रही है। बताते हैं कि यमुना शनि की बहन हैं और भैयादूज से लेकर अक्षय तृतीय तक यमुना की खरसाली में ही पूजा होती है। यमुना की पूजा उनियाल जाति के लोग करते हैं। यहां भी मंदिर समिति व परिवार की बारी से पूजा की परंपरा है।

खरसाली गांव यमुनोत्री मार्ग में स्थित हनुमान चट्टी के निकट यमुना नदी के दूसरी ओर स्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई करीब 7000 फुट है। यमुना मंदिर और शनि मंदिर के अतिरिक्त यहां एक और दर्शनीय मंदिर है, वह है सोमेश्वर मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है। खरसाली गांव प्रकृति की मनोरम छटा के मध्य बसा है, जिसके आसपास हरे-भरे बुग्याल हैं। कोनिफरस और ओक के वृक्षों की इस क्षेत्र में बहुलता है। कुछ वर्षो बाद यह स्थान ग्रीष्म ऋतु में होने वाली तीर्थ यात्रा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन जायेगा, जब यहां से यमुनोत्री तक ‘रोपवे’ बनाने की योजना पूर्ण होगी। यमुनोत्री धाम बड़कोट से लगभग 50 कि.मी. दूर है। धाम से पहले 6 कि.मी. पर खरसाली गांव है। जानकी चट्टी तक बस सेवा और इसके बाद 1 कि.मी. पैदल दूरी तय कर खरसाली गांव पहुंचा जा सकता है। इस गांव में लगभग ढाई सौ परिवार निवास करते हैं। इस जगह की प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत और मन को शांति पहुंचाने वाली है। खरसाली जाने के लिए उत्तरकाशी से बड़कोट, हनुमान चट्टी होकर पहले जानकी चट्टी पहुंचना होता है।

केदारनाथ-ऊखी मठ
केदारनाथ को ग्यारहवां ज्योतिर्लिग कहा जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह देवालय समुद्रतल से करीब 11,000 फुट की ऊंचाई पर है, जहां दशहरे के आसपास ही हिमपात शुरू हो जाता है और केदारनाथ की 14 कि़मी. चढ़ाई कठिन होने लगती है। इसके कपाट खुलने की तिथि ऊखीमठ में तय की जाती है और कपाट बंद होने की तिथि केदारनाथ में तय की जाती है। भगवान आशुतोष हिमालय की चोटियों पर बने मंदाकिनी नदी के मूल में स्थित भूमि पर एक भव्य मंदिर में विराजते हैं।

6 माह तक यहां पर कर्नाटक के लिंगायत पद्धति के रावल भगवान के मुख्य रावल होते हैं और मुख्य रावल द्वारा निर्धारित किये गए पुजारी केदारनाथ तुंगनाथ और मदमहेश्वर के पुजारी तय किये जाते हैं। ऊखीमठ के लक्ष्मी प्रसाद भट्ट कहते हैं, ‘भगवान केदारनाथ 6 महीने यहां विराजते हैं और 6 महीने भगवान की उत्सव डोली गौरीकुंड, गुप्तकाशी होते हुए ऊखीमठ ओंकारेश्वर मंदिर में लायी जाती है। पुन: केदारपट खुलने तक केदारनाथ की पूजा-अर्चना ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में होती है।’ बहुरंगी छवि वाला यह मंदिर बहुत ही सुंदर है।
मंदाकिनी घाटी में लगभग 4500 फुट की ऊंचाई पर स्थित ऊखीमठ अपने आप में एक प्रसिद्ध स्थान है। इस स्थान का नाम बाणासुर की पुत्री उषा के नाम पर पड़ा था। ऊखीमठ में उषा, अनिरुद्ध, पार्वती और मांधाता को समर्पित मंदिर भी हैं। इस स्थान पर ठहर कर सैलानी देवरिया ताल भी जा सकते हैं। यह पारदर्शी ङील अत्यंत रमणीक स्थल है। ऊखीमठ रुद्रप्रयाग से 42 कि़मी़ दूर है।

बद्रीनाथ-जोशीमठ   
चार धामों में सबसे अंत में मार्गशीर्ष माह की शुक्ल प्रथमा पर बद्रीनाथ के कपाट बंद होने की परम्परा है। विष्णु भगवान को समर्पित बद्रीनाथ मंदिर का शीतकालीन पूजा स्थल जोशीमठ है। उस दिन भगवान की उत्सव प्रतिमा को बड़ी धूमधाम से जोशीमठ लाया जाता है। जोशीमठ आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्यातिर्मठ है। बद्रीनाथ में साक्षात् भगवान विष्णु तपरत हैं। पूरी दुनिया में भगवान श्री हरि का अकेला विग्रह बद्रीनाथ में ऐसा है, जहां भगवान पद्मासन में बैठे हैं। नर-नारायण पर्वत के बीच अलकनंदा जिन भगवान बद्री विशाल के चरण धोती है, वह बद्री विशाल समुद्रतल से ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां 6 माह जब कपाट खुलते हैं तो दक्षिण भारत केरल के नंबूरीपाद ब्राह्मण मुख्य पुजारी या रावल होते हैं। वे तब तक ब्रह्मचारी रहेंगे, जब तक भगवान बद्री विशाल की पूजा-अर्चना करेंगे और जब गृहस्थ स्वीकार करेंगे तो उनके विकल्प में नंबूरीपाद ब्राह्मण परिवार के ही नायब रावल रावल की भूमिका में रहते हैं। बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि टिहरी राजा के दरबार में राज पुरोहित पंचांग में मुहूर्त के अनुसार तय करते हैं और फिर बद्रीनाथ के कपाट भव्य परंपरानुसार ग्रीष्मकाल में खुलते हैं तथा कपाट बंद होने की तिथि का निर्धारण भी बद्रीनाथ में राजगद्दी को साक्ष्य मान कर धर्माधिकारी तय करते हैं। बद्रीनाथ में पहले मुख्य पुजारी आदि गुरु शंकराचार्य की परंपरा के आचार्य ही करते थे, परंतु बाद में इस व्यवस्था में परिवर्तन किया गया। बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अनसूया प्रसाद भट्ट कहते हैं, ‘कपाट बंद होने पर भगवान बद्री विशाल की उत्सव डोली में भगवान उद्धव और कुबेर की मूर्ति योगध्यानबद्री पांडुकेश्वर लायी जाती है और आगामी 6 माह तक भगवान बद्री विशाल की पूजा जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में मठांगण में होती है। इस समय भी यहां काफी लोग आते हैं।’

जोशीमठ आने वाले सैलानी 12 कि़मी़ दूर स्थित औली अवश्य घूम कर आते है। सर्दियों में हिमपात के बाद औली हिमक्रीड़ा का केन्द्र बन जाता है। औली जाने के लिए जोशीमठ से रोपवे ट्रॉली द्वारा जा सकते हैं। इन दिनों वहां से प्रकृति का अद्भुत सौन्दर्य देखने को मिलता है।

उत्तराखंड में स्थित बद्री-केदार और गंगोत्री-यमुनोत्री के पवित्र देवालय पहाड़ों में इतनी ऊचाई पर हैं कि शीत ऋतु में वहां हर ओर बर्फ का साम्राज्य छा जाता है। तब इन देवालयों के इष्टदेव निचले स्थानों पर स्थित मंदिरों में पूजे जाते हैं। युगों-युगों से चली आ रही इस परम्परा के वाहक ये चारों पवित्र स्थान सर्दियों के चार धाम कहे जाने लगे हैं। चलिए इस  शीत ऋतु में चलते हैं सर्दियों के चार धामों की यात्रा पर

शीतकाल के पूजा स्थल
गंगोत्री  मुखवा
यमुनोत्री  खरसाली
बद्रीनाथ  जोशीमठ
केदारनाथ  ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ
तुंगनाथ  मक्कूमठ
रुद्रनाथ  गोपेश्वर

ध्यान दें
ये चारों स्थान सड़क मार्ग द्वारा जुड़े हैं, इसलिए वहां जाने के लिए यात्रियों को पैदल नहीं चलना पड़ता। जोशीमठ, ऊखीमठ, खरसाली और मुखवा जाने के लिए ऋषिकेश से बस और टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं। इतना ही नहीं, गर्मी में चारों धामों पर भक्तजनों की विशाल भीड़ होती है। ऐसे में इस समय आने वाले लोग न सिर्फ सुविधा से दर्शन कर पाते हैं, बल्कि ठहरने की सुविधा भी आसानी से सुलभ और तुलनात्मक रूप से सस्ती हो जाती है।

माधव सेमवाल, केदारनाथ के धर्माधिकारी
भगवान केदारनाथ की उत्सव मूर्ति ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में लाई जाती है और यहां पर नियुक्त पुजारी विधि-विधान के साथ भगवान केदारनाथ की उत्सव मूर्ति की पूजा उसी तरह करते हैं, जैसे कपाट खुलने पर ग्यारहवें ज्योतिर्लिग के रूप में भगवान केदारनाथ की पूजा की जाती है। शीतकाल में ओंकारेश्वर मंदिर में भगवान आशुतोष और भगवती जगदंबा की पूजा करने का पुण्य लाभ मिलता है।

जगदम्बा प्रसाद सती, बद्रीनाथ के धर्माधिकारी
शीतकाल में भगवान बद्री विशाल की पूजा-अर्चना जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर में होती है। मूल रूप से भगवान उद्धव और कुबेर की मूर्ति कपाट बंद होने पर योग ध्यान बद्री मंदिर पाडुकेश्वर में लाई जाती है, परंतु यात्री और श्रद्धालु शीतकाल में भगवान बद्री विशाल के दर्शन जोशीमठ में ही कर सकते हैं। शीतकाल में भगवान बद्री विशाल के दर्शन नरसिंह रूप में करने पर उतना ही पुण्य प्राप्त होता है, जितना कि कपाट खुलने पर बद्रीनाथ में भगवान बद्रीनाथ विशाल के दर्शन करने से प्राप्त होता है।

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