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बिहारियों के इस दर्द को समझिये

मुंबई में राहुल राज को सीने पर गोली सिर्फ इसलिए मार दी जाती है कि उसके हाथ में पिस्तौल थी। कर्नाटक के इंजीनियरिंग कॉलेजों से बिहारी लड़कों की इतनी पिटाई कर दी जाती है कि वे सामूहिक रूप से कॉलेज छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। रेलवे या बैंक की नौकरी के लिए परीक्षा देने गए बिहारी छात्रों की पिटाई की खबरें हम अक्सर सुनते रहे हैं। ब्रह्मापुत्र की घाटियों में लंबे समय से बसने वाले बिहारियों पर हमला हो जाता है। असम के चाय बागानों से बिहारी खदेड़े जाते हैं। मुंबई की अट्टालिकाओं के निर्माण में लगे और पंजाब के खेतों में रोपनी करते, दिल्ली के गारमेंट उद्योग में खून-पसीना लगाने वाले बिहारी मजदूरों को हेय दृष्टि से देखा जाता रहा है। पिछले हफ्ते लुधियाना में बिहारियों के साथ हुआ दुर्व्यवहार न पहली घटना है, न ही आखिरी।

विभिन्न प्रांतों में जाकर काम करने वाले बिहारी मजदूरों की यात्रा सत्तर-अस्सी के दशक में भी तकलीफदेह हुआ करती थी, जब टिकट कटाने के बावजूद उन्हें ट्रेन के डिब्बों के ऊपर बैठना पड़ता था। कथित सभ्य लोग गरीब और दबे-कुचले लोगों को ठेलकर बाहर जाने को मजबूर कर देते थे। श्रमिकों के ट्रेन से गिरकर और कटकर मरने की घटनाएं कई बार हुई हैं। सवाल उठता है कि क्यों कोई अपना घर-द्वार छोड़कर बाहर जाने को मजबूर होता है? क्या करे? परिवार का पेट भरने की खातिर पलायन मजबूरी है। इसके लिए यहां व्याप्त जमींदारी सोच भी एक बड़ी वजह है।

सीधी बात करें, तो आसानी से कहा जा सकता है कि पिछले छह दशकों तक ऐसी कोई बड़ी कोशिश की ही नहीं गई कि सिर्फ पेट के लिए कोई प्रदेश न छोड़े। जब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था, तब बिहार के पास प्राकृतिक संसाधन भी ठीक-ठाक थे। उपजाऊ जमीन थी। नदियां थीं। खानें थीं। फिर बिहारियों को क्यों भटकना पड़ता था। यों आजादी के पहले भी बिहारी मजदूर बाहर जाया करते थे, लेकिन बाद में यह रफ्तार कई गुना बढ़ गई। अब जाकर बिहार में इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण और नरेगा की बदौलत थोड़ी स्थितियां बदली हैं, पर मंजिल अभी दूर है। बिहारियों को वापस लाना कोई मुद्दा नहीं है। होना भी नहीं चाहिए। अपने प्रदेश के युवाओं को नौकरी में प्राथमिकता देने की बात अलग है।

यह बात दूसरी है कि इससे भी बिहारी प्रभावित होता है। अपने आपको समृद्ध बनाने के लिए कोई भी कहीं जा सकता है। लेकिन, जब तक बिहार में उद्योग-धंधे लगने की रफ्तार तेज नहीं होती, तब तक रोजी-रोटी की मजबूरी में बिहारी अपने देश में कहीं काम पाने का अधिकार तो रखते ही हैं। देश के हर हिस्से के लोगों को पूरे सम्मान के साथ कहीं भी काम करने की आदर्श स्थिति होनी चाहिए। चाहे वो देश के किसी कोने में बिहारी मुसहर समुदाय के लोग ईंट निर्माण में लगे मिलें अथवा लुधियाना या चंडीगढ़ में रिक्शा चलाते और दिल्ली और पुणे में तिपहिया चलाते। हर किसी की भी श्रम की मर्यादा का सम्मान किया जाना चाहिए।

बिहारियों के साथ मारपीट बीते दशकों की बात नहीं है, लेकिन नई बात यह भी है कि बिहारियों के बारे में पहले की तुलना में नजरिया बदला है। उन्हें गंदा बताया गया, तो कभी झगड़ा-झंझट करने वाला। विशेषण समय के साथ बदलते रहे हैं। बिहारी श्रमिकों की उद्यमिता और श्रम को सम्मान देने के बदले स्थानीयता बोध के कारण लोगों का नजरिया बदल जाता है। इसके कारण आर्थिक भी हैं। सस्ता श्रमिक होने के कारण उनकी पूछ भी होती है और लंबे समय से एक ही तरह के काम करने के कारण वे दक्ष भी होते हैं। फिर भी कई जगह स्थानीय लोगों को तात्कालिक तौर पर लगता है कि गड़बड़ियों का कारण यही लोग हैं।

बिहार से जाने वाले श्रमिकों से अलग बिहारियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता ने प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना सिक्का जमाया है। युवाओं का यह समूह प्रतियोगी परीक्षाओं में देश के हर हिस्से में बेहतर प्रदर्शन करता है। दूसरे प्रदेशों में इन्हें खदेड़ दिया जाता है। अपनी प्रतिभा के बल पर कुछ पाने की कोशिश करने वालों को डंडे का इस्तेमाल संकुचित सोच ही तो है। आखिर बिहारियों को टेढ़ी नजर से क्यों देखा जाता है? इसका बड़ा कारण सांस्कृतिक भी है। बिहार के लोग देश के चाहें जिस भी हिस्से में जाते हैं, अपने में मस्त रहते हैं।

अपनी भाषा यानी भोजपुरी में बातें करते हैं और भोजपुरी फिल्मों से दिल बहला लेते हैं लेकिन स्थानीय लोगों से बहुत ज्यादा घुलते-मिलते नहीं हैं और न ही उनसे बहुत वास्ता रखते हैं। अपना काम लगन और मेहनत से करते हैं, सो मालिक भी उन्हें पसंद करते हैं। लेकिन, ये सब बातें वहां के स्थानीय लोगों के एक वर्ग को अखरती हैं। स्थानीय लोग बिहारियों को अपने लिए और अपनी संस्कृति के लिए खतरा मान बैठते हैं। ऐसा नहीं है कि बिहारी पंजाबी संस्कृति से अपने को नहीं जोड़ता, भांगड़ा नहीं डालता, मुंबई में गणपति बप्पा मोरया.. का जयघोष नहीं करता। अब तो भोजपुरी फिल्मों में भी गिद्दा और भांगड़ा देखा जा सकता है। बात सिर्फ गलतफहमी की है।

कभी कभी तो लगता है कि महाराष्ट्र, पंजाब और असम को पश्चिम बंगाल से सीख लेनी चाहिए। सीख इस मामले में कि बिहारियों की श्रमशक्ति का उपयोग कर पश्चिम बंगाल विकास की राह पर तेजी से बढ़ा है। बढ़ा तो पंजाब, महाराष्ट्र भी है तो  बंगाल में उन्हें तिरस्कार नहीं मिलता। यहां बिहारियों पर हमले नहीं होते। उन्हें खदेड़ने की आवाज नहीं उठती। लेकिन, मुंबई और पंजाब में ऐसा नहीं है। जबकि, इन प्रांतों के विकास में भी बिहारियों की जबरदस्त भागीदारी है। यह कहा जाए कि बिहारी कई बार महाराष्ट्र और पंजाब  की ‘लाइफलाइन’ नजर आते  हैं, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी, घर-घर दूध पहुंचाने से लेकर इमारतें खड़ी करने में।

जब भी बिहारी बर्बरता के शिकार होते हैं, वहां से वापसी की बात उठती है। लुधियाना में हमले के बाद भी यह बात उठ रही है। लेकिन, ऐसे आसार नहीं हैं। राज्य सरकार का हालिया रवैया उन्हें कुछ सुविधाएं दिला सकता है। पंजाब के उपमुख्यमंत्री जूनियर सुखबीर सिंह बादल ने इस दिशा में पहल भी की है। लेकिन, इन सबसे इतर खास बात यह कि बिहार सरकार को भी ठोस और सार्थक कदम उठाने होंगे, ताकि पलायन रुके। यहां की श्रमशक्ति यहीं के विकास में लगे। जब ‘घर’ की स्थितियां मजबूत होंगी, तो ‘बाहर वाले’ भी बिहारियों की तरफ आंख उठाकर नहीं देख सकेंगे।

लेखक हिंदुस्तान पटना के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

Aaku.srivastava@hindustantimes.com

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