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चाटुकारिता का पतन

आजकल जमाना वैसा नहीं रहा। न हवा वैसी, न पानी वैसा, न गेहूँ में स्वाद, न सब्जियों में। पहले दालें ऐसी कि यूं ही उबाल लो तो घी जैसी सुगंध आए। अब दालें घी के भाव बिक रही हैं, लोग घी में दाल की गंध ढूंढ़ते हैं। घी भी वैसा कहां रहा, यूरिया, वनस्पति तेल और कौन-कौन से रसायन डाल कर घी बनाते हैं। असली बात यह है कि वैसे आदमी ही नहीं रहे। असली भले लोग कहां मिलते हैं। यहां तक कि नीच लोग भी उस क्वालिटी के नहीं मिलते। हर ओर यही हाल है, चाटुकार भी कहां रहे आजकल कायदे के जिन्हें कायदे से मक्खन लगाना भी नहीं आता हो।

नमूना राहुल गांधी ने भी देख लिया। रीता बहुगुणा जोशी ने वक्तव्य दे मारा कि राहुल जी कितने बहादुर हैं देखिए। घुप अंधेरे में, जीरो विजिबिलिटी में हेलीकॉप्टर उतरवा दिया। पायलट मना कर रहे थे लेकिन राहुल जी नहीं माने। अब राहुल गांधी मना करते फिर रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। घुप अंधेरा नहीं था, पायलटों ने अपनी मर्जी से हेलीकॉप्टर उतारा। ऐसा भी क्या मक्खन लगाना कि सामने वाला ही फिसल जाए।

चाटुकारिता की संस्कृति वह नहीं रही। इसे हमने राजा महाराजाओं के जमाने में विकसित किया, लोकतंत्र में उसे और शानदार बनाया। ढंग के चाटुकार पहले होते थे जो चाटुकारिता ऐसी करते थे कि नेता तो चने के झाड़ पर चढ़े ही साथ में चाटुकार भी दो चार टहनियां चढ़ जाए। यह भी क्या बात हुई कि ऐसी प्रशंसा करो कि फुनगी पर चढ़ा नेता नीचे गिर पड़े। सुना है राहुल गांधी चाटुकारों को ज्यादा भाव देने के खिलाफ हैं। होना ही चाहिए, ऐसे प्रशंसक किस काम के जो ढंग से प्रशंसा करना न जाने, मुश्किल में और फंसा दें।

इसी कौशल के पतन की वजह से राजनीति में परिवारवाद बढ़ रहा है। पहले नेता ढेर सारे चमचे पाल रखते थे, जो वक्त वक्त पर ‘जिंदाबाद’ कर देते थे, गाहे-बगाहे पैर छूते थे। अब तो बाहर वालों पर भरोसा ही नहीं किया जा सकता इसलिए नेता सिर्फ घर वालों पर ही भरोसा करते हैं। यह लोकतंत्र के खिलाफ है। चाटुकारिता से लोकतंत्र का विस्तार होता है। अच्छे चाटुकार का कोई राजनैतिक सूत्र न हो, तो भी वह चाटुकारिता के जरिए राजनीति में जगह बना सकता था, इस तरह सत्ता का विकेन्द्रीकरण होता था। अब तो राजनैतिक परिवारों में भी वह बात नहीं है। अपने नंबर बढ़वाने के लिए रीता जी  ने राहुल जी के ही नंबर कटवा दिए। यह अच्छी बात नहीं है। क्या कोई राजनैतिक दल.. स्तरीय चाटुकार बनाने के लिए कोई कार्यक्रम बनाएगी। इसकी साफ जरूरत है।

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