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हालात बदलें तो यह नहीं होगा

अल्फा प्रमुख अरविन्द राजखोवा को अंतत: बांग्लादेश ने भारत को सौंप दिया है। बड़ा ही अचरज होता है यह जानकर कि राजखोवा एक स्वतंत्रता सेनानी उमाकांत राजनोवार के बेटे हैं जिनकी तीन साल पहले मौत हो चुकी है। बाप जहाँ देश को आजाद करने की जंग में शामिल हुआ, वहीं बेटा उस आजाद देश का दुश्मन बन बैठा। यह पता लगाने की जरूरत है कि आखिर किन हालातों में सीधा और सरल जीवन व्यतीत करने वाले उत्तर-पूर्व के ये निवासी देश की मुख्य धारा से काटकर आतंकवादी या उग्रवादी बन गए?
शैलेश कुमार, महावीर इन्क्लेव, नई दिल्ली - 110 045

बाल आहार में भ्रष्टाचार
खराब मिड डे मील खाने से बच्चों के बीमार होने की खबरें चौंकाती हैं। भ्रष्टाचार हमारे समाज में इस हद तक पैठ बना चुका है कि अब बच्चों के खाने तक को मिलावटी कर या घटिया बना उसमें भी अपना फायदा ढूंढ़ा   जाता है। यह योजना बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए थी लेकिन उन्हें बीमारियां ही देती है। जब तक ऐसी घटनाओं को खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं होगी और दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, बच्चे शिकार बनते रहेंगे।
अंकित सिंहल, मंगोलपुरी, नई दिल्ली

अवसरवादी मित्रता
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के कभी कर्मठ नेता कहे जाने वाले कल्याण सिंह का नाता समाजवादी पार्टी से टूट गया है। लोकसभा चुनाव से पूर्व वे बढ़े ही ताव के साथ मुलायम सिंह से जा मिले थे। मगर लोकसभा में तो उन्हें करारी शिकस्त मिली ही और रही -सही कसर अपनी पुत्रवधू डिंपल यादव के हारने से पूरी हो गई। ज़ो कल्याण सिंह कभी मुलायम सिंह को अपना बड़ा भाई कहते फिर रहे थे आज उन्हें ही धोखेबाज बता रहे हैं। ये पहले मित्रता करते हैं और अवसर मिलते ही उसे तोड़ देते हैं। यह महज अवसरवादी मित्रता है और कुछ नहीं।
अंकित सिंघल, पी-1/53 मंगोलपुरी, नई दिल्ली

सिर्फ ‘हवा’ खा
भारी महंगाई सिर पे, गरीब क्या खाएगा
पानी भी हुआ महंगा, बोल क्या पिएगा।
इसलिए प्यारे तू सिर्फ हवा खा और हवा पी।
वह भी था जमाना, जब दूध-मलाई खाई
आज तो हर शै ने प्यारे, बुरी मिलावट पाई।
साक्षात भसीन, 16/487, फैज रोड, करोल बाग, दिल्ली

भाषा विवाद
इंग्लिश प्रिंट मीडिया और टीवी चौनलों द्वारा हिंदी के विरुद्ध एक मुहिम चलाई जा रही है। दुष्प्रचार किया जा रहा है कि हिन्दी भारत की संपर्क भाषा होने के उपयुक्त नहीं है, इस कारण इंग्लिश को सभी के ऊपर संपर्क भाषा के तौर पर थोपा जाना चाहिए। मेरे विचार में इंग्लिश में इतनी सामथ्र्य नहीं है कि वह संपर्क भाषा का स्थान ले सके। हम इंग्लिश के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन भारत में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही अपने को स्थापित करती जा रही है। ऐसे में अंग्रेजी की क्या जरूरत।
डॉ. एस शंकर सिंह, बी 003, डैफोडिल्स एपार्टमेंट, सेक्टर 6, द्वारका, नई दिल्ली 110075

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