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बासमती चावल अपनी जन्मस्थली में खो रहा है पहचान

अपनी खुशबू के लिए मुगल शासक अकबर के दरबारी अबुल अफल की कृति (आईने अकबरी) और चीनी यात्री हेनसांग से सराहना पा चुका उत्तर प्रदेश के तराई इलाके बिजनौर के नगीना में पैदा होने वाला बासमती चावल अपनी जन्मस्थली में ही पहचान खोता जा रहा है।

इस चावल की खुशबू ने देश के अलावा विदेशों में भी धूम मचाई। रंग,सुगंध और स्वाद के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पाने वाले इस बासमती चावल की खुशबू अब कहीं खो गई है क्योंकि किसान इसकी खेती करने में अब रूचि नहीं ले रहे हैं। चीनी यात्री हेनसांग को दीवाना बना देने वाले इस चावल की खुशबू पहली बार इसी यात्री के माध्यम से विदेश गई और पूरे विश्व में छा गई। वर्ष 1932 से लगातार शोध के दौर से गुजरी बासमती की इस प्रजाति में कम होती सुगंध चिंता का विषय है।

नगीना कृषि अनुसंधान केन्द्र ने इस प्रजाति के चावल पर कई शोध किए लेकिन एन 10 और एन 11 ही अपेक्षित ख्याति पा सकी। अनुसंधान केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक लेखराज सिंह ने कहा कि रासायनिक खादों के निरंतर प्रयोग से जमीन में मौजूद सुगंध के जीवाणु धीरे धीरे कम हो रहे हैं। साथ ही धान की अग्रिम रोपाई भी सुगंध पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।


 सिंह के अनुसार नगीना शोध केन्द्र में 2003 में सुगंधित चावल की कुछ किस्में हैदराबाद के अनुसंधान निदेशालय से लाई गई थी। इन किस्मों की पैदावार अन्य किस्मों से ज्यादा है और यह 10-15 दिन पहले तैयार हो जाती हैं। इन प्रजातियों में किसी प्रकार का रोग लगने की आशंका भी नहीं के बराबर होती है। पूरी दुनियां में खुशबू वाला बासमती सिर्फ भारत में ही पैदा होता है।

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