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एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज, रोमांच मस्ती

एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज, रोमांच मस्ती

याद करो जब तुम्हारे किसी बड़े भाई-बहन को कॉलेज में सिर्फ इसलिए एडमिशन मिला, क्योंकि वह स्पोर्ट्स में कई प्रतियोगिताएं जीत चुके थे। एनसीसी, स्काउट, डांस, पेंटिंग ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां तुम अपनी रुचि के अनुसार कुछ समय  दे सकते हो। आज तुम जैसे बच्चों टीवी के अनेक सीरियल्स में छाए हुए हैं। अधिकतर विज्ञापनों में तुम बच्चों ही नजर आते हो। दरअसल ऐसे बच्चों अपनी पढ़ाई के साथ-साथ स्कूल के नाटकों, प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने में कभी नहीं हिचके।
 
नजरिए में बदलाव
एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज से तुम पॉजिटिव हो जाते हो। तुम्हें लगने लगता है कि तुम किसी भी क्षेत्र में कुछ भी कर सकते हो। ऐसे बच्चों को देख कर ही लगता है कि वे आत्मविश्वासी हैं।  ऐसी एक्टिविटीज तुम्हें अनुशासित बनाती हैं, तुम्हारे अंदर टीम स्प्रिट की भावना पैदा करती हैं, तुम्हें समय का पाबंद बनाती हैं। सबसे बड़ी बात, तुम में हारने के बावजूद फिर से जीत सकने का जज्बा पैदा करती हैं। और तुम जीतते भी हो।
 
होते हैं रिफ्लेक्सेस शार्प
क्लास में जब तुम्हारी टीचर अचानक से कुछ पूछती है तो स्मार्ट बच्चों तुरंत उतर दे देते हैं। तुम गौर करना, वे जरूर किसी न किसी एक्टिविटीज में शामिल होंगे। ये एक्टीविटीज रिफ्लेक्सेस को शार्प करती हैं। उदाहरण के लिए, डिबेट में भाग ले रहे उस हाजिर जवाब बच्चों को देखो, जो तुम्हारे प्रश्न पूछने पर घबराता, ठिठकता नहीं, तुरंत उसका जवाब दे देता है। उस बॉक्सर को देखो, जो अपने ओर आ रहे पंच को पहले से ही भांप लेता है और खुद के बचाव के लिए चौकन्ना  हो
जाता है।
 
कहलाओगे स्मार्ट
हम में से सभी के अंदर कुछ न कुछ खास योग्यता व दक्षता होती है, जो हमें दूसरों से अलग बनाती है और इन्हीं खास गुणों को जिसने अभ्यास के बल पर तराशना सीख लिया, वही स्मार्ट कहलाता है। आवश्यकता इस बात की होती है कि हम अपनी खास प्रतिभा को पहचानें और उसे निखारें।

करियर की राह
अगर तुम भी स्पेनिश, फ्रेंच, इटेलियन या अंग्रेजी क्लब का हिस्सा हो तो उस भाषा में महारत हासिल कर लो। क्या पता, कल खेल-खेल में सीखी यही भाषा तुम्हारी ताकत बन जाए, तुम्हें करियर की कोई राह सुझा दे। इसी तरह तुम म्युजिक  क्लब, एस्ट्रोनॉमी क्लब, पर्यावरण क्लब, ड्रामा क्लब, फोटोग्राफी क्लब आदि के हिस्से भी बन सकते हो। क्या पता कल इन्हीं  से तुम्हारा नाम बन जाए।  

एक्टिविटीज ये भी कम नहीं
दोस्तो, स्कूल की मैगजीन में सक्रिय योगदान दो। उसके रिपोर्टर बनो और उसका संपादन भी तुम्हीं बच्चों में से कोई करे। इसके अलावा जिनकी रुचि डांस में होती है, उनमें कुछ स्वाभाविक गुण होते हैं। डांस तकनीक की मदद तो फुटबॉल, बास्केटबॉल खिलाड़ियों के लिए भी ली जाती है, क्योंकि डांस से शरीर इतना लचीला हो जाता है कि मैदान में उनके कदम तेज चलते हैं। नतीजा यह होता है कि उन्हें चोटें भी कम आती हैं। 

खेल के मैदान में उतर कर
अगर तुम्हारी रुचि मैदान में उतरने की है तो स्पोर्ट्स एक्टिविटीज जैसें बास्केटबॉल, बेसबॉल, जिमनास्टिक्स, फुटबॉल, ऐरोबिक्स, वॉलीबॉल, टेनिस, हॉकी, स्विमिंग, चैस आदि में भाग लो। ये ऐसे खेल हैं, जिन्हें तुम अपनी रुचि के अनुसार अपनाते हो। जरूरी नहीं कि तुम ऐसे ही खेलों को चुनो, जिसमें ज्यादा खिलाड़ियों की जरूरत पड़ती है। तुम रेस, स्केटिंग, टेनिस, स्विमिंग आदि खेलों में भी रुचि दिखा सकते हो, जिसमें बड़े ग्रुप की जरूरत नहीं। सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, विश्वनाथन आनंद, अभिनव बिंद्रा, सानिया मिर्जा यूं ही इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुंचे। उनका बचपन इन्हीं खेलों के अभ्यास में गुजरा है। 

सेहतमंद हैं सबसे तेज
दोस्तो, हाल ही में स्वीडन में एक शोध हुआ। यह शोध 12 लाख स्वीडिश सैनिकों पर किया गया, जो 1950 से 1976 के बीच जन्मे थे। नतीजे में पाया गया कि अच्छी फिटनेस रखने वाले लोगों का आईक्यू भी ज्यादा होता है। स्वीडन के साहल्ग्रेंस्का अकादमी केप्रोफेसर माइकल निल्सन ने कहा, ‘फिट रहने की वजह से आपके दिमाग को भी अधिक ऑक्सीजन मिलती है, इसलिए दिमाग तेज हो जाता है। इस शोध में सैनिकों के सेना में रहते समय की जिंदगी और बाद की जिंदगी की तुलना की गई, जिससे पता चला कि जो 18 वर्ष की उम्र में फिट थे, उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और ज्यादा अच्छी नौकरी पाई।

एक्टिविटीज ने दी इन्हें प्रेरणा
दादा साहेब फाल्के
दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है। कारण उनकी बनाई हुई फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) भारत की पहली फिल्म थी। उनके नाम पर स्थापित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार फिल्म जगत की एक जानी-मानी हस्ती को हर वर्ष दिया जाता है।  दादा साहेब फाल्के का पूरा नाम धुंधिराज गोविन्द फाल्के था। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के त्र्यम्बकेश्वर (नासिक) नामक स्थान पर हुआ था। बचपन से ही उनकी कला संबंधी विषयों में बहुत रुचि थी। 15 वर्ष की आयु में आजीविका कमाने के लिए ड्राइंग सीखने वे जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स, बंबई में भर्ती हुए, लेकिन कलाओं में रुचि होने के कारण उन्होंने बड़ौदा के कला भवन में फोटोग्राफी, मॉडलिंग, आर्किटेक्चर और जादू जैसी कलाएं भी सीखीं। इन कलाओं से उनको बड़ी ऊर्जा मिली और आगे चल कर ये उनके फिल्म निर्माण के काम में बड़ी सहायक सिद्ध हुईं।

सर सी.वी. रमण
रमण प्रभाव के जनक सर चन्द्रशेखर वेंकटरमण को 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला। 1954 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया। उनका जन्म 7 नवम्बर, 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के पास एक गांव में हुआ।
बालक चन्द्रशेखर वेंकटरमण को नैतिक शास्त्र, गणित और दर्शनशास्त्र का ज्ञान अपने पिता से विरासत में मिला। स्वयं उनकी भी इन विषयों में बहुत रुचि थी। इसी कारण वे आगे चल कर एक महान वैज्ञानिक बने, लेकिन इन विषयों के साथ-साथ उनकी रुचि संगीत में भी खूब थी। बचपन में ही वे वॉयलेन बहुत अच्छा बजाने लगे थे।
उनकी पत्नी वीणा बजाने में प्रवीण थी। इन दोनों वाद्य यंत्रों ने चन्द्रशेखर वेंकटरमण के वैज्ञानिक मन को बहुत प्रेरणा और ऊर्जा प्रदान की। कॉलेज में पढ़ते समय उन्होंने तारों की झनकार पर प्रयोग किए थे। आगे चल कर उन्होंने इस विषय पर और प्रयोग किए और उन प्रयोगों से निकले भौतिकी के नतीजों पर उन्होंने एक लेख लिखा, जो रॉयल सोसाइटी की पुस्तिका ‘प्रोसिडिंग्स’ में प्रकाशित होकर प्रशंसित हुआ।

इंदिरा गांधी
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवम्बर, 1917 को नेहरू परिवार में इलाहाबाद के आनंद भवन में हुआ। उनका पूरा नाम इंदिरा प्रियदर्शिनी था। बाद में फिरोज गांधी के साथ विवाह होने के कारण उनके नाम के साथ गांधी शब्द जुड़ गया। जब इंदिरा छोटी थीं, तब आनंद भवन में राष्ट्रीय नेताओं का आना-जाना लगा रहता था।

आनंद भवन में उनके कारण हरदम राजनीतिक वातावरण बना रहता, इसीलिए बचपन में ही इंदिरा की रुचि भी राजनीति में हो गई। पढ़ाई करने के साथ-साथ इंदिरा राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहती थीं। बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही वे राजनीति में उतर आईं। उस समय उन्होंने कांग्रेस की सहायता के लिए बच्चों की एक वानर सेना बनाई, जिसमें आगे चल कर 70,000 बाल सैनिक तैयार हो गए। बचपन में बनाई यह वानर सेना इंदिरा को प्रेरणा देती रही और वे राजनीति में आगे बढ़ती रहीं। फिर तो वे भारत की प्रधानमंत्री बनने के साथ-साथ दुनिया की एक बड़ी सफल राजनीतिज्ञ भी बन गईं। दोस्तो, देखा तुमने इन महान लोगों को बड़े होकर अन्य गतिविधियों से कैसे फायदा पहुंचा।


खेल रखते हैं मुझे एकदम फिट: साहिल
डी.पी.एस. द्वारका के 16 वर्षीय छात्र साहिल जिंदल ने इस वर्ष दसवीं कक्षा में 98 प्रतिशत अंक हासिल कर दिल्ली में टॉप किया। वह अपनी सफलता का श्रेय नियमित पढ़ाई को देता है। साहिल को साइंस व मैथ्स से काफी लगाव है। स्टडीज के बाद जितना भी समय उसे मिलता है, उसमें खेल व एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज को देता है। साहिल कहता है कि खेल में बिताए गए समय से शरीर फिट रहता है व दिमाग ‘फ्रैश’ हो जाता है, जिसकी वजह से पढ़ाई में एकाग्रता से ध्यान लगा पाता है। टेनिस, फुटबॉल व क्रिकेट उसके पसंदीदा खेल हैं। 2010 के विश्व कप फुटबाल का उसे बेसब्री से इंतजार है। कभी-कभी टेनिस सीखने हरि नगर स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में जाता है। टेस्ट क्रिकेट में भारत के ‘नं. 1’ बनने पर खुश है। साहिल कहता है कि एक्टिविटीज हमें आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा भी देती हैं। किताबें पढ़ने का उसे क्रेज है। हैरी पॉटर काफी हद तक पढ़ डाली है। डिटेक्टिव नॉवल्स उसे आकर्षित करते हैं। जासूसी उपन्यासों की तरह वह अपनी ‘कैलकुलेशन’ व ‘एनालिसिस’ में परफेक्ट होना चाहता है। साहिल का मानना है कि स्कूल पढ़ाई के अतिरिक्त एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में दिया गया समय फायदा ही पहुंचाता है। मैंने फिट रहने के लिए मैदान में समय दिया।

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