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पर्यावरण और खाद्य संकट की चुनौतियां

वातावरण में बदलाव की समस्या तो है ही, साथ ही दुनिया ने मोटे तौर पर यह भी समझ लिया है कि खाद्य सुरक्षा को लेकर बहुत ज्यादा आश्वस्त नहीं रहा जा सकता। हरित क्रांति से जो हासिल हुआ था अब वह हाथ से निकल रहा है। चंद रोज पहले ही रोम में हुए संयुक्त राष्ट्र खाद्य सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि दुनिया के एक अरब लोगों को हर रोज भूखे सोना पड़ता है। हो सकता है यह संख्या ज्यादा बड़ी हो। 2007-08 में खाद्य पदार्थो की कीमतें बढ़नी शुरू हुई थीं और इसी समय भूखे रहने वालों की संख्या में खासा इजाफा भी हुआ था, यह समस्या इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है।

अगले 40 साल में देश की आबादी छह अरब से बढ़कर नौ अरब हो जाएगी। इस दौरान शाकाहारी भोजन की मांग 70 फीसदी बढ़ेगी और मांसाहारी की मांग तो दोगुनी हो जाएगी। कृषि के विस्तार के लिए हमारे पास बहुत सीमित संभावनाएं ही बची हैं लेकिन खाद्य आपूर्ति बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत तो पड़ेगी ही। पिछले 25 साल में कृषि में निवेश लगातार घट रहा है।

जनेटिकली मॉडीफाइड फूड के अलावा कृषि पर होने वाला शोध भी बहुत ज्यादा नहीं हो रहा। हरित क्रांति के दौरान हमने फसलों की पैदावार को तीन से छह फीसदी तक बढ़ा लिया था, अब यह बस एक फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। कुछ जगह तो इस पर विराम ही लग गया है। इसी से उपजे भय के चलते पिछले एक साल में सरकारों ने कृषि पर निवेश बढ़ा दिया है। विश्व बैंक जैसे संगठन भी कृषि को प्राथमिकता देने लगे हैं।
भारत जैसे देश के लिए तो यह चुनौतियां और भी गंभीर हैं। इस संकट को ऐसे भी समझा जा सकता है कि उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि के बावजूद सरकार को गेहूं आयात करना पड़ा है। हालांकि इसका एक कारण कुप्रबंधन भी था।

गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने के मुख्य आधार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए गेहूं की खरीद का काम ठीक ढंग से नहीं किया गया था। संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान गरीबों पर खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने की मार तो पड़ी ही, साथ ही इस दौरान खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति उपलब्धता भी काफी कम हुई। यह आंकड़ा 2002 में 494 ग्राम प्रतिदिन से ज्यादा था जो पांच साल बाद घटकर 439 ग्राम पर पहुंच गया। ग्लोबल हंगर इंडैक्स में भूख से लड़ रहे 88 देशों की सूची में भारत का नंबर 66वां है। ग्लोबल इनवेस्टमेंट रिसर्च इंस्टीटय़ूट के अनुसार, ऐसे 180 देशों की फेहरिस्त में भारत का नंबर 94वां है और अगर बाल कुपोषण सूचकांक को देखें तो वहां भारत 117वें नंबर पर है, सिर्फ बांग्लादेश से आगे। और यह समस्या खाद्यान्न की उपलब्धता की नहीं है, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कुप्रबंधन की है।

हाल में खाद्यान्न की कीमतों में जो तेजी आई है, उसका गरीब तबकों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। पिछले कई सप्ताह से यह कीमतें काफी तेजी से बढ़ रही हैं और इसके चलते खाद्य पदार्थो की महंगाई का सूचकांक नवंबर के दूसरे सप्ताह में ही साढ़े पंद्रह फीसदी का आंकड़ा पार कर गया था।

भारत के हिसाब से देखें तो खाद्य सुरक्षा को लेकर मुख्य चुनौतियां क्या हैं?
पहला तो यह कि आत्मनिर्भरता एक महत्वपूर्ण नारा है। साथ ही खाद्यान्न का बाजार बहुत बड़ा है और हमें पूरी बुद्धिमानी से इसके नए बाजार ढूंढ़ने चाहिए वह उनका पूरा फायदा उठाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार से गलत समय पर खाद्यान्न खरीदने से यह काफी बढ़ी हुई कीमतों पर ही मिल पाता है जिससे हमारा सब्सिडी खर्च बढ़ जाता है।

दूसरा खतरा यह है कि ग्लोबल वार्मिग से कृषि उत्पादकता काफी तेजी से घट सकती है। साथ ही अनाज में प्रोटीन की मात्र भी कम हो सकती है। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी नई किस्मों को खेजने की है जिनमें उत्पादन ज्यादा हो, पानी और उर्वरक की जरूरत कम हो तथा कीटनाशकों का इस्तेमाल भी ज्यादा न करना पड़े।

तीसरा संकट यह है कि लोगों की आमदनी बढ़ने से उनकी प्राथमिकताएं बदल रही हैं, जबकि इस होड़ में खाद्य उत्पादन पीछे छूट रहा है। चीन और दूसरे विकासशील देशों में मांसाहारी प्रोटीन की मांग बढ़ी है। इस पर बहुत ज्यादा जोर दिए जाने का असर पर्यावरण पर भी पड़ा है, क्योंकि पशुपालन मीथेन गैस को भी बढ़ाता है। पर्यावरण की जरूरत के हिसाब से लोगों के खान-पान का ढंग बदलना सबसे बड़ी चुनौती है।

पर्यावरण के बदलाव से ही पैदा हुई चौथी चुनौती यह है कि दुनिया की आबादी तो तेजी से बढ़ रही है, लेकिन खेती के लायक जगह कम हो रही है। कई देश दुनिया भर में कृषि के लिए नई जमीन तलाश रहे हैं, आगे चलकर इससे राजनैतिक असंतुलन बन सकता है। खेतिहर आबादी को दूसरी जगहों पर बसाने का काम कृषि के तौर-तरीकों में विविधता लाने के लिए किया जा सकता है।

पांचवीं चुनौती बागवानी, डेयरी और मत्स्य पालन से होने वाली आमदनी को प्रोत्साहित करने की है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने इसके कई प्रयोग किए हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर स्वामीनाथन का कहना है कि समुद्र का खारा जल पानी का हमारा सबसे बड़ा स्रोत है इसलिए इसमें झींगे की खेती नई खेती का सबसे अच्छा उदाहरण हो सकती है। इसी से जुड़ी हुई एक बात यह भी है कि ग्लेशियर और आइसबर्ग पिघलने की वजह से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है और इसकी वजह से इसके पानी के खारेपन में भी कमी आएगी जिसका पूरी दुनिया के जनजीवन पर काफी गहरा असर पड़ेगा।

आज पूरी दुनिया के सामने जो चार बड़ी चुनौतियां हैं वे हैं आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा। जीवन की सुरक्षा और संपत्ति की सुरक्षा जैसी मूल सुरक्षाओं को अगर हम छोड़ दें तो बाकी तीन सुरक्षाओं में गहरा रिश्ता भी है। भूखे और कुपोषित लोगों को खाना देना एक आर्थिक ही नहीं मानवीय चुनौती भी है।

लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और संसद सदस्य हैं

hindustanfeedback@gmail.com

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