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स्टेशन पर बने अस्पताल की हालत है बदतर

दिल्ली से सटे गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुविधाओं के लिए बने अस्पताल की हालत बदतर है। सुविधाओं के नाम तो हालिया अस्पताल में कुछ है ही नहीं? बाहर न तो कहीं मराज के बैठने क ी व्यवस्था है और नहीं गेट के बाहर सफाई। अस्पताल की अंदरूनी हालत देखने से कहीं से नहीं लगता कि यह अस्पताल है। मसलन, वहां न तो अस्पताल जैसी कोई बात है और नहीं सुविधाएं। महज तहसील स्तर के कस्बे की तरह ही अस्पताल के नाम पर बड़ी डिस्पेंसरी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसा नहीं है कि अस्पताल परिसर में जगह का अभाव है। अस्पताल में सवेरे नौ बजे से लेकर एक बजे तक तथा शाम में छह से सात बजे तक डाक्टर के बैठने का समय निर्धारित है लेकिन मेन जंक्शन स्टेशन के एकदम पास होने के बाद भी वहां पूरे दिन सन्नाटा छाया रहता है।


अस्पताल के पार्क के अलावा गेट के बाहर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है। शाम के बाद मेन गेट से किसी का निकलना भी दूभर हो जाता है क्योंकि गेट के सामने ही खुले में लोग मूत्रलय बना रखा है। फिर कुछ स्मैकिए व अन्य असामाजिक तत्व का जमावड़ा से आम लोंगों व महिलाओं का वहां से निक लना मुश्किल हो जाता है। रात की बात तो दूर दिन-दोपहर भी वहां कोई फटकता तक नहीं। अस्पताल के बाहर की अव्यवस्था के संबंध में कोई डाक्टर या रेल अफसर मुंह तक खोलने को तैयार नहीं है।

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