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पूजाघर की जगह

सार्वजनिक स्थलों पर अवैध कब्जा कर पूजाघर बनाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की मुस्तैदी स्वागत योग्य है। अदालत ने सोमवार को फिर अपने उस आदेश को दोहराया है, जो उसने इसी साल 29 सितंबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान दिया था। अदालत ने सभी राज्यों को आदेश दे रखा है कि जिला कलेक्टर इस बात की निगरानी करें कि किसी सार्वजनिक स्थल पर अवैध कब्जा कर मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर या गुरद्वारा न बनाया जाए।

अदालत का यह भी कहना है कि जहां अवैध कब्जा कर इस तरह निर्माण हो चुका है, उसे स्थानीय प्रशासन एक-एक मामले को देख कर निपटाए। स्पष्ट तौर पर सुप्रीम कोर्ट ने जो काम अपने हाथ में लिया है, वह बेहद चुनौतीपूर्ण है। हमारे देश में सार्वजनिक स्थलों पर अवैध कब्जा कर पूजा घर बनाने की प्रवृत्ति एक राष्ट्रीय बीमारी का रूप ले चुकी है और इसके लिए किसी बेहद कुशल डॉक्टर की निगरानी में लंबे इलाज की जरूरत है। जो अवैध निर्माण पहले हो चुके हैं, वे आगे के निर्माण का आधार बनते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें हटाया जाने लगता है, मामला धार्मिक भावनाओं से होते हुए सामुदायिक और सांप्रदायिक तनाव तक पहुंच जाता है।

इस चुनौती के आगे प्रशासन अमन की दुहाई देकर अक्सर हाथ खड़े कर देता है। कई बार अवैध कब्जा कर बने पूजास्थलों के चलते सड़क, पुल और फ्लाईओवर अपना रास्ता बदल देते हैं। हालांकि  इस तरह के तथ्य भी हैं कि ढांचागत निर्माण के लिए जब जमीन का अधिग्रहण किया जाता है तो उसमें पहले से बने हुए कई पूजास्थलों को या तो हटाना पड़ता है या फिर वे खत्म हो जाते हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को हर मामले पर अलग से विचार करने को कहा है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट एक कुशल डॉक्टर के रूप में इस बीमारी के इलाज में तभी सफल हो सकता है, जब राज्य सरकारें, प्रशासन और राजनीति भी भावनात्मक आग्रहों से ऊपर उठ कर धर्मनिरपेक्ष मानसिकता से कानून और व्यवस्था की हिफाजत करें। अगर ऐसा नहीं किया गया तो इस तरह के आदेश को पक्षपातपूर्ण तरीके से लागू किए जाने के खतरे हैं। निष्पक्षता को दरकिनार करने वाली सरकारें इसकी व्याख्या अल्पसंख्यकों के खिलाफ  कर सकती हैं। लेकिन यहां सरकार और प्रशासन से कम जिम्मेदारी नागरिकों की नहीं है। जरूरत इस बात की है कि देश का नागरिक सार्वजनिक स्थल की महत्ता को स्वीकार करते हुए उसे किसी पूजाघर से ज्यादा पवित्र माने।

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