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एनपीटी और बदलते वक्त में भारत

भारत की आज़ादी के दो साल पहले ही अमेरिका और रूस के बीच शीतयुद्ध शुरू न हुआ होता तो शायद दक्षिण एशिया की शक्ल कुछ और होती। शायद कश्मीर समस्या न होती। होती भी तो किसी और रूप में। शायद अफगानिस्तान में खूंरेज़ी न होती। इराक और ईरान के हालात कुछ और होते। पश्चिम एशिया की रंगत कुछ और होती वगैरह। जिनके पास वक्त इफरात है वे अक्सर ऐसी पहेलियाँ बुझाते रहते हैं। कई बार ये पहेलियाँ हमारी समस्याओं के समाधान में भी सहायक होतीं हैं।

फिलहाल हमारी दिलचस्पी भारत-अमेरिका रिश्तों में है। हमें लगता है कि चीन की तुलना में अमेरिका हमारी उपेक्षा करता है। या पाकिस्तान को खुश रखने की कोशिश करता है। सच यह है कि आज़ादी के बाद से नब्बे के दशक तक भारत-अमेरिका रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे। एक दौर में भारत की हर समस्या के पीछे सीआईए का हाथ होता था। दूसरी ओर बड़े नेता, व्यापारी और कलाकार एक बार अमेरिका ज़रूर जाना चाहते थे। हाल के वर्षो में अमेरिका की अलोकप्रियता सारी दुनिया में बढ़ी, फिर भी मार्च 2006 में प्यू रिसर्च सेंटर के एक सर्वे से ज़ाहिर हुआ कि दुनिया भर के देशों में अमेरिका को पसंद करने वाले सबसे ज्यादा लोग भारत में हैं।

आज़ादी के पहले नवम्बर 1941 में भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों की औपचारिक बुनियाद पड़ गई थी, जब सर गिरजा शंकर बाजपेयी को वॉशिंगटन में और टॉमस विल्सन को दिल्ली में दूत बनाया गया था। तब अंग्रेज सरकार थी। राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट भारतीय आज़ादी के समर्थक थे। भारत और अमेरिका के रिश्तों में स्वाभाविक राजनयिक गर्मजोशी क्यों नहीं रही, इस पर कभी और चर्चा करेंगे। इतना समझ में आता है कि अमेरिकी नेतृत्व ने नेहरू के मन को पढ़ने की कोशिश नहीं की और नेहरू ने जिस तटस्थता की कल्पना की वह एकतरफा थी। अक्सर वह सोवियत संघ की ओर झुकी नज़र आती थी।

विभाजन के साथ ही कश्मीर समस्या के संयुक्त राष्ट्र में जाने के बाद वहाँ पश्चिमी देशों के रुख से इस अविश्वास को बल मिला। कोरिया के मामले में भारत का रुख असमंजस का था। उधर पाकिस्तान सीटो और सेंटो में शामिल होकर पश्चिमी खेमे में पहुँच गया। नेहरू ने अपनी गुट निरपेक्षता की नीति के लिए तमाम बातों के अलावा डेढ़ सौ साल पहले की अमेरिकी नीति का हवाला भी दिया। नेहरू के राष्ट्रवाद का ‘सामाजिक तत्व’ अमेरिकी प्रशासन को लाल खतरे का संकेत देता था। उस दौर में अमेरिका को साम्यवाद के नाम से जूड़ी ताप चढ़ जाता था।

आज अमेरिका के साथ हमारे रिश्ते एक दूसरी बुनियाद पर हैं। सन् साठ तक भारत शांति का पुजारी था। सन् बासठ के चीनी युद्ध ने हमारी कुछ अवधारणाओं में बुनियादी हेर-फेर कर दिए हैं। राजनैतिक स्थिरता, सामरिक शक्ति और आर्थिक समीकरण आज के दौर में सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं, पर हमारे दिमाग शीत युद्ध से बाहर नहीं आए हैं। 1974 में भारत के एटमी धमाके के बाद से लगी पाबंदियाँ अभी तक पूरे तौर पर खत्म नहीं हो पाई हैं।

भारत-अमेरिकी न्यूक्लियर डील पिछले तीन साल से चर्चा में है। पर उसकी तार्किक परिणति अभी तक सामने नहीं आ पाई है। 1968 की न्यूक्लियर नॉन प्रॉलिफरेशन ट्रीटी यानी एनपीटी बड़ा अड़ंगा है। अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील होने और परमाणु ईंधन सप्लायर्स ग्रुप की स्वीकृति मिल जाने के बाद भी पेच हैं। भारत को अमेरिका ने, दूसरे शब्दों में सारी दुनिया ने, एटम बमधारी देश मान लिया है। पर नहीं भी माना है। पाकिस्तान भी ऐसा देश है और शायद इस्नयल भी। पर उनके मुकाबले भारत की स्थिति अलग है। अब तीन या चार तरह के देश हैं। एक शुद्ध बमधारी। दूसरा भारत। तीसरे पाकिस्तान और इस्नयल और चौथे वे देश, जो बमधारी नहीं है, पर एनपीटी में हैं।

एनपीटी शीत युद्ध की देन है। शीत युद्ध और खासकर शस्त्र प्रसार जारी रहता तो अमेरिका और रूस दोनों के लिए खरनाक होता। अमेरिका और रूस की शस्त्र परिसीमन संधियों के दौरान यह संधि निकल कर आई। संयोग है इसमें शामिल पाँच देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य भी हैं। भारत का एटमी कार्यक्रम इस संधि से पहले का है। हमारा कार्यक्रम नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए ही था, पर चीन और पाकिस्तान से युद्धों के बाद भारतीय विदेश नीति व्यावहारिक धरातल पर आई। 1974 का धमाका करते वक्त हमने यह नहीं कहा कि हम बम बना रहे हैं। हमने एनपीटी पर दस्तखत भी नहीं किए थे। साथ ही एटम बम का विरोध भी करते थे। यह एक विसंगति है, जिससे बाहर निकलना चाहिए।

हाल में कोलकाता के एक अंग्रेजी दैनिक ने खबर छापी कि भारत कोशिश कर रहा है कि एनपीटी में संशोधन कर उसे छठी एटमी ताकत मान लिया जाए। पता नहीं इस खबर में कितना दम है, पर ज़रूरी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी ढोंग खत्म हो। एनपीटी मूल रूप में 25 साल के लिए थी। 1995 में आम सहमति से तय किया गया कि इसे अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया जाए। 1968 में संधि पर जब दस्तखत हो रहे थे, तब एटम बमधारी देशों में से केवल तीन (अमेरिका, ब्रिटेन और रूस) ही इसके सदस्य थे। चीन और फ्रांस 1992 में शामिल हुए। संधि का उद्देश्य एटमी हथियारों का प्रसार रोकना, शस्त्र परिसीमन और एटमी ऊर्जा का शांतिपूर्ण इस्तेमाल है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कम से कम चीन के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदार मानना चाहिए। एनपीटी का सदस्य होने के बावजूद चीन ने नाभिकीय तकनीक पाकिस्तान को दी। उसे किसने सजा दी? 

जॉर्ज बुश ने जब न्यूक्लियर डील की घोषणा की उस वक्त लगभग साफ था कि अमेरिका ने भारत को नाभिकीय शस्त्रधारी देश मान लिया है। हालांकि तमाम बातें आज भी गोपनीय हैं, पर यह साफ है कि विश्व स्तर पर दोहरे मापदंड चल रहे हैं। एनपीटी मूलत: अमेरिका की ही देन है। उसे ही इसमें भारत के लिए सम्मानजनक जगह बनानी होगी। पर ओबामा प्रशासन के लिए ऐसा फैसला करा पाना खासा मुश्किल होगा। उनकी लोकप्रियता यों भी कम हो रही है। पाकिस्तान और इस्नयल के सवाल भी उठेंगे, पर अमेरिका ने न्यूक्लियर डील सिर्फ भारत के साथ की है, पाकिस्तान के साथ नहीं। भारत-अमेरिका रिश्तों की कसौटी में अक्सर पाकिस्तान बीच में होता था, पर आज हालात में अलग हैं। भारत की वैश्विक भूमिका बढ़ रही है। नेहरू युग में भारत की नैतिक पहचान थी, आज आर्थिक है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की अपनी मजबूरियाँ हैं। आने वाले वक्त में पाकिस्तान को हमारी ज़रूरत होगी और हमें उसकी।

pjoshi@hindustantimes.com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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