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पहले भी शहीद हुए हैं मन्दिर-मस्जिद

करीब पाँच सौ साल पहले जामा मस्जिद या बूतखैर बाकी के नाम से तामीर इमारत (अब बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्म भूमि) पर अंग्रेजों की सियासी शरारत का खामियाजा हिन्दू-मुस्लिम आज भी भुगत रहे हैं। छह दिसम्बर तो बस बदनाम है, लेकिन इससे पहले भी कई बार दोनों पक्ष वर्चस्व की जंग में इस तारीखी इमारत को आँच पहुँचाते रहे हैं। वहाँ पहले भी मन्दिर-मस्जिद शहीद हुए हैं। बाबरी बनाम राम मन्दिर से जुड़ी कुछ फाइलें जब एक अफसर की हादसे में मौत के बाद गायब हुईं, तो ‘तारीख-ए-अवध’ की जरूरत पड़ी। यह पुस्तक अक्तूबर 1894 में सैय्यद कमाल उद्दीन हैदर हसनी ने उर्दू में लिखी थी। इसका अनुवाद अब कोर्ट के स्तर पर हुए आदेश के बाद किया जा रहा है।


कानपुर में ‘तारीख-ए-अवध’ जैसी दुर्लभ पुस्तक रखने वाले मौजूद हैं। इसमें कानपुर से जुड़ी कई ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख तो है, साथी ही उस मस्जिद-मन्दिर की जिन्दा कहानी भी है, जिसने हिन्दू-मुस्लिम एकता को कई बार तार-तार करने की कोशिश की। खासतौर पर जो सियासत इसे लेकर आज विभिन्न राजनीतिक दल कर रहे हैं, वह तब भी वैसे ही हुआ करती थी। पुस्तक में हनुमान गढ़ी का नाम चर्चित है, और यहाँ तामीर की गई मस्जिद को लेकर विवाद काफी पुराना बताया गया है। एक स्थान पर लिखा है, ‘अवध की बुलंदी पर जिसका नाम हिन्दू ने हनुमान गढ़ी रखा है, एक मस्जिद बराए सलातीन थी, जिसकी देखरेख एक फकीर मुसलमान किया करता था। उसी स्थान पर इमली के पेड़ के दरख्त के नीचे झण्डी गाड़ कर एक छोटी-सी कोठरी बनाई और उसमें बुत रख कर स्थान को हनुमान गढ़ी करार दिया’। आपसी एकता के माहौल में टकराव होते रहे। बीच-बीच में दोनों इमारतों को तोड़ने और दोबारा बनाए जाने की घटनाएँ भी चलती रहीं। 1860 में बाबरी मस्जिद का रजिस्ट्रेशन हुआ और 1860 में इकबाल सिंह ने यहाँ चबूतरा बनाया। 1877 में अंग्रेज अफसर ने मन्दिर का सिलसिला जोड़ कर इसे गजेट में अंकित कराया। 1883 में अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने इस विवाद को और हवा दी और इसे मन्दिर-मस्जिद के असमंजस में डाल दिया। यह वह दौर था, जब हिन्दू-मुस्लिम देश को आजाद कराने के लिए एकजुट हो कर संघर्ष कर रहे थे। दोनों ही पक्ष इस साजिश को भांप नहीं पाए और इसका नतीजा यह निकला कि बीच-बीच अंग्रेजों के बहकावे से टकराव बना रहा। वक्त के साथ जामा मस्जिद, बाबरी मस्जिद, मीर बाकी की याद में मस्जिद जैसे नामों से इसे पुकारा गया। लेकिन पिछले पौने दो साल से भी ज्यादा वक्त से यह नाम मन्दिर के साथ भी जुड़ा रहा।

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