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दैवत्वपूर्ण जीवन

जीवन तीन तरह का होता है। पहला परोपकारी जीवन, दूसरा सामान्य जीवन और तीसरा अपकारी जीवन। इसे उत्तम, मध्यम और अधम जीवन भी कहा जा सकता है। उत्तम जीवन उनका होता है, जिन्हें दूसरों का उपकार करने में सुख का एहसास होता है, भले ही उन्हें उससे कष्ट या नुकसान उठाना पड़े। इसे यज्ञीय जीवन भी कहा जाता है। यही दैवत्वपूर्ण जीवन है। इस जीवन का आधार यज्ञ होता है। शास्त्र में यज्ञ उसे कहा गया है, जिनसे प्राणीमात्र का हित होता है। यानी जिन कर्मों से समाज में सुख, ऐश्वर्य और प्रगति में बढ़ोत्तरी होती है।

चारों वेदों में कहा गया है- धरती का केन्द्र या आधार यज्ञपूर्ण जीवन ही है, यानी सत्कर्मों पर ही यह धरती टिकी हुई है। इसलिए कहा गया है कि यदि पृथ्वी को बचाना है तो श्रेष्ठ कर्मों की तरफ समाज को लगातार प्रेरित करने के लिए कार्य करना चाहिए। सामान्य जीवन वह होता है जो परम्परा के मुताबिक चलता है। यानी अपना और दूसरे का स्वार्थ सधता रहे। कोई बहुत ऊंची समाजोत्थान या परोपकार की भावना नहीं होती है।

अपकारी यानी दूसरों को परेशान और दुख देने वाला जीवन ही राक्षसी जीवन या शैतानी जिंदगी कही जाती है। इस तरह के जीवन से ही समाज में सभी तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। इस धरती को यदि समस्याओं और हिंसा से मुक्त करना है तो दैवत्वपूर्ण जीवन की तरफ विश्व समाज को चलना पड़ेगा। सत्कर्म तभी किए जा सकते हैं, जब हम सोचविचार कर कर्म करेंगे।

विचार के साथ किया हुआ कर्म ही अपना हित तो करता ही है परिवार, समाज और दुनिया का भी इससे भला होता है। जितना हम प्राणीहित के लिए संकल्पित होंगे, उतना हमारा बौद्घिक और आत्मिक उत्थान होता जाएगा। हमारे अंदर मनुष्यता के भाव लगातार बढ़ते जाएंगे। प्रेम, दया करुणा, अहिंसा, सत्य और सद्भावना की प्रवृति लगातार बढ़ती जाएगी। और ये सारे सद्गुण ही जीवन यज्ञ को सफल बनाने के लिए जरूरी माने गए हैं।

 

 

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