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एम्बुलेंस सायरन का दुरुपयोग

एम्बुलेंस सायरन का उपयोग मरीज को ले जाने के वक्त इमरजेंसी में किया जाता है ताकि रास्ते में ट्रैफिक जाम न हो, जिससे मरीज को आसानी से अस्पताल में भर्ती किया जा सके। लेकिन आजकल बहुतेरे एम्बुलेंस चालक बिना मरीज के भी एम्बुलेंस सायरन का धड़ल्ले से दुरुपयोग करते हैं, ताकि उनके आगे वाला उनको आसानी से साइड दे दे। ऐसे एम्बुलेंस चालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
नितेश राय, दिल्ली विश्वविद्यालय

गैर जिम्मेदार सांसद
ये कैसे हैं हमारे सांसद जो संसद में सवाल पूछने के बजाए संसद से अनुपस्थिति रहते हैं। संसद की एक दिन की कार्यवाही के लिए लाखों रुपया खर्च होता है, लेकिन सांसद को इससे कोई मतलब नहीं है। अगर ये सांसद संसद की कार्यवाही को हल्के ढंग से लेते हैं तो इन्हें भत्ता लेने का भी कोई अधिकार नहीं।
मनीष कुमार चौधरी, लक्ष्मी नजर, नई दिल्ली

एक खतरनाक घटना
कैगा परमाणु ऊर्जा संयंत्र के वाटर कूलर में किसने रेडियोधर्मी ट्राइटियम युक्त पानी मिलाया, वह भी जलनिकासी वाली कूलर की ‘ओवरफ्लो’ लाइन से (क्योंकि इनफ्लो लाइन तो सीलबंद होती है), इसकी पूरी और त्वरित जांच हो कि ऐसा कौन असंतुष्ट कर्मचारी है, जिसने अपने ही सहकर्मियों के जीवन के साथ ऐसा घिनौना खिलवाड़ किया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह एक सोची-समझी साजिश हो और इसके तार दूसरे किसी देश में पल रहे और पनाह ले रहे भारत के दुश्मनों के साथ जुड़े हों?
डॉ. आर. के. मल्होत्रा, 179, नीलगिरी अपार्टमेंट्स, अलकनंदा, नई दिल्ली

महानदी एक्सप्रेस फिर चलाएं
सोलह वर्षो से रेल पटरी पर दौड़ रही, स्व. महाराजा माधव राव सिंधिया की लाडली ‘महानदी एक्सप्रेस’ बंद करना उस महान आत्मा को अपमानित करने वाला कृत्य है। महानदी एक्सप्रेस बिलासपुर के जम्मू वाया रायपुर, नागपुर, भोपाल, दिल्ली प्रति दिन चलाई जाए, ताकि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र तथा मध्या प्रदेश की धर्मप्राण जनता को माँ वैष्णो देवी के दुर्लभ दर्शन हो सकें साथ ही दिल्ली की ओर जाने-आने में भारी असुविधा से राहत मिल सके।
सेवक यादव, भोपाल

इंसाफ की चाह में
पच्चीस बरस पहले देश ने एक ऐसी त्रासदी देखी, जिसके जख्म आज पच्चीस साल बाद भी हरे हैं। ‘भोपाल गैस त्रासदी’ जिसने 22 हजार लोगों को मौत के आगोश में सुला दिया और लगभग 5 लाख जिंदगियों को प्रभावित किया। लेकिन सरकारी आंकड़ों से सिर्फ डेढ़ लाख लोगों को ही जगह क्यों मिली, ये कोई नहीं जानता, शायद जिन्हें छोड़ दिया गया, उनका दर्द सरकार से भी देखा नहीं गया, इसीलिए उन्हें वहीं मरने के लिए छोड़ दिया गया। जिस कंपनी की गलती से यह हादसा हुआ वह भी सस्ते में छूट गई। सरकारी दावे और भरोसे तो न जाने कितने किए गए, लेकिन कितने पूरे हुए यह जग जाहिर है। इंसाफ अभी बाकी है।
मनोज रायकवार, जामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली

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