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सूचनाओं से संचालन

आतंकवाद से मुकाबले के लिए आंकड़ों के महाभंडार के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने का स्वागत किया जाना चाहिए। उम्मीद है कि 21 तरह के आंकड़ों के नेटवर्क को जोड़ने वाले इन सहस्रनेत्रों से ही राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड का निर्माण हो जाएगा और वह इतना सक्षम होगा कि आतंकवादी किसी न किसी मोड़ पर पकड़े ही जाएंगे।

यह आंकड़े हर तरह के इंसान के जीवन की अहम जरूरतों से जुड़े हुए हैं। मसलन बैंक, जीवन बीमा, आयकर , टेलीफोन, परिवहन, पुलिस स्टेशन, विदेशी पंजीकरण दफ्तर और मतदाता परिचय पत्र यह सब ऐसे स्थान और उपकरण हैं, जिन्हें बाइपास कर आजकल न तो अच्छे काम किए जा सकते हैं, न ही बुरे। इन जगहों पर रिकार्ड तो पहले भी रखा जाता रहा है, लेकिन उनका विधिवत वर्गीकरण और दूसरे विभागों से तालमेल नहीं होता था।

तालमेल की इसी कमी और विभागों के भीतरी झोल का इस्तेमाल करते हुए अपराधी अपनी गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। अमेरिका में भी 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमले के बाद तमाम तरह के आंकड़ों के सहस्रनेत्रों को सजग करने और उनसे लगातार निगरानी रखने की प्रक्रिया शुरू हुई। वहां इस काम में नागरिक स्वतंत्रता की अड़चनों को देखते हुए राष्ट्रीय कानून भी पास करना पड़ा। जाहिर है अमेरिका को आधुनिक प्रौद्योगिकी के इस सुनियोजित उपयोग का लाभ मिला और वहां फिर कोई आतंकी हमला नहीं हो सका। गृहमंत्री ने हाल में अमेरिका यात्रा के दौरान वहां के आतंकविरोधी इंतजामों के सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्षों का अध्ययन किया है और वे उससे सबक लेते हुए अपने देश में भी वैसी व्यवस्था करना चाहते हैं।
 
आंकड़ों के महाभंडार, राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड और उसे विशिष्ट पहचान संख्या से जोड़ना यह सब उसी ढर्रे पर किए जा रहे प्रयोग हैं। लेकिन इनके बारे में कुछ सवाल उठ सकते हैं और उठने भी चाहिए। सवाल यह है कि क्या डेढ़ से दो साल के भीतर यह परियोजना पूरी हो जाएगी? अगर पूरी भी हो गई तो क्या उन आंकड़ों पर लगातार निगरानी रखने वाले सक्षम अधिकारी हमारे पास होंगे? इनके अलावा यह भी सवाल है कि जिन दस एजंसियों को इन सूचनाओं के संचालन की जिम्मेदारी दी गई है वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता की किस हद तक हिफाजत कर पाएंगीं? लेकिन इन आशंकाओं से बचने के लिए हमें गृहमंत्री के आश्वासन और संविधान के विवेक पर भरोसा करना चाहिए।

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