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सावधान! ये मौसम है डिप्रेशन का

कमजोर दिल और दिमाग वाले लोग सावधान! ये मौसम न केवल जानलेवा है बल्कि यह जान देने के लिए प्रेरित भी कर सकता है और अवसाद इस मौसम की सबसे बड़ी बीमारी है। परिणामस्वरूप आम दिनों की अपेक्षा इस मौसम में अवसाद के मरीजों की संख्या भी दोगुनी हो जाती है। उनमें अकेलेपन, हताशा, भूख न लगने, बेचैनी, नींद न आने व भावशून्यता आदि के लक्षण अधिक देखने को मिलते हैं। इस अवस्था में उनके अंदर आत्महत्या के विचार आते हैं और वह इसका प्रयास भी करते हैं।

मौसम का मिजाज किसी भी व्यक्ति को मानसिक रूप से बीमार कर सकता है और मौसम की मन पर मार के चलते उपजा दिमागी रोग बन रहा है मौसमी अवसाद। आखिर क्या है यह अवसाद जिसमें मौसम का व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक क्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है? इसे विंटर डिप्रेशन सिंड्रोम कहते हैं। इसका असर शरीरतंत्र पर पड़ता है, जो ठंड के दिनों में आसानी से देखा जा सकता है और इसके सबसे ज्यादा शिकार अवसाद के मरीज होते हैं।

दरअसल, मस्तिष्क के अंदर सेराटोनिन नाम का रसायन पाया जाता है जो न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता है। न्यूरोट्रांसमीटर रसायन सूर्य की रोशनी में ही सक्रिय होते हैं, पर इन दिनों रसायन का सक्रिय होना कम हो जाता है जिस कारण लोगों में निराशा व चिंता के लक्षण बढ़ जाते हैं। आमतौर पर व्यक्ति के मूड में सामान्य दिनचर्या के दौरान भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। व्यवहार में तेजी और उदासी के पीछे दैनिक परेशानियां कारण हो सकती हैं। किंतु यह अवसाद की वह स्थिति है जब व्यक्ति के व्यावहारिक क्रियाकलापों और मानसिक स्थिति में परिवर्तन का दौर मौसम के कारण आता है। अवसाद की यह स्थिति सामान्य से अधिक गंभीर होती है। यह लंबे समय तक बनी रहती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के निजी और व्यावहारिक जीवन में मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं।

मनोवैज्ञानिक इस डिऑर्डर के बढ़ते शिकारों के प्रति चिंतित हैं। दरअसल, व्यक्ति के विचारों, भावनाओं और क्रियाकलापों में आने वाला उतार-चढ़ाव जब बार-बार मौसम के चलते आता है तो इस मौसमी अवसाद को वातावरण से उपजे रोगों की गंभीर श्रेणी में खड़ा करना लाजिमी हो जाता है। इस बीमारी में न चाहते हुए भी व्यक्ति के व्यवहार में तीव्रता या हीनता आ जाती है, जिस पर उसका कोई बस नहीं चलता और लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि कुछ भी चिंताजनक नहीं लगता। खासियत यह है कि सर्दियों में यह रोग अवसाद के रूप में सामने आता है। रोग की तीव्रता सर्दियों में अक्तूबर से फरवरी तक बनी रहती है।

यूं तो बदलते मौसम के साथ वातावरण में परिवर्तन आते हैं। इन परिवर्तनों के साथ शरीर के कुछ रासायनिक पदार्थ सामंजस्य नहीं बना पाते। इसलिए चिकित्सा विज्ञानी मानते हैं मेलोटोनिन, सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे प्रमुख रसायनों के स्नव में भारी कमी या वृद्धि के चलते भी यह रोग हो जाता है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिकों की राय में आनुवांशिकता भी इस रोग का प्रमुख कारण है। यदि माता-पिता में पहले से ही कोई इस बीमारी का शिकार है तो संतान में यह प्रवृत्ति होने की संभावना बढ़ती है।

मस्तिष्क में स्थित ग्रंथि जिसे पाइनल कहते हैं, से मेलाटोनिन नामक रसायन निकलता है जो मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण के नियंत्रण में सहायक होता है और इसका सीधा संबंध सूर्य की रोशनी से होता है। मेलाटोनिन रसायन का असर रोगी की नींद पर पड़ता है और इसकी कमी के कारण रोगी में नींद न आने की, बेचैनी, चिड़चिड़ेपन तथा अकेलेपन की शिकायत बढ़ जाती है। इन दिनों ज्यादातर मामलों में देखा जा रहा है कि सूरज की रोशनी में न बैठने की कमी के कारण रोगी की हालत सुबह के वक्त ज्यादा खराब रहती है।

आम दिनों की अपेक्षा सर्दियों में अवसाद के अधिकांश मामले अस्पताल पहुंचते हैं। इनमें पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या अधिक होती है। उनमें  मुख्यत: भावशून्यता, नींद न आने की व अकेलेपन की भावना देखी जाती है और ऐसी परिस्थितियां किसी भी व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करती हैं।

लक्षण
सर्दियों में शारीरिक रसायनों का स्नव तेजी से होने लगता है जिससे असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है। मरीज को बार-बार और तेजी-से गुस्सा आता है। इसमें अत्यधिक चिड़चिड़ापन, आवश्यकता से कई गुना अधिक काम करना, हड़बड़ी में रहना जैसे लक्षण परिलक्षित होते हैं।

समस्याग्रस्त व्यक्ति सर्दियों में उदास और दु:खी रहता है। रोजमर्रा के कार्यो के प्रति उसकी दिलचस्पी कम हो जाती है। यहां तक कि पसंदीदा कार्यो में भी अरुचि होने लगती है। वह अधिकांश समय बिस्तर में घुसा रहता है और नहाने-धोने को टालता है। भूख बहुत कम लगती है। इसके अलावा मरीज की सोने की आदतों में बदलाव आ जाते हैं। सदा आलस्य महसूस करना, एकाग्रचित न हो पाना, नकारात्मक सोच में डूबे रहना और स्वयं को नाकाबिल समझने लगता है। बीमारी के बढ़ जाने पर आत्महत्या तक के विचार
भी आते हैं।

इलाज
सम्पूर्ण चिकित्सा के जरिए 80 प्रतिशत मरीज ठीक हो जाते हैं किंतु यदि मौसमी अवसाद का समय रहते इलाज न करवाया जाए तो व्यक्ति आजीवन इसका मरीज बना रहता है। इलाज के दौरान दवाइयों के माध्यम से मरीज के अवसाद को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। साथ ही तेजी के दौर (एक्साइटमेंट) और उदासी के लक्षणों में वृद्धि को रोकने के लिए मूड स्टेबलाइजर दवाएं दी जाती हैं। जरूरत पड़ने पर फोटोथेरेपी और प्रोफीलेक्सिस का सुझाव भी दिया जाता है। दवा के साथ मनोचिकित्सक से नियमित काउंसलिंग भी जरूरी है। सर्दियों के अवसाद में साइकोथेरेपी बेहतर परिणाम देती है। 

इसके अंतर्गत मरीज को व्यावहारिक चिकित्सा, संज्ञानात्मक थेरेपी और संवाद थेरेपी दी जाती है। इस माध्यम से अवसाद के कारणों को सुलझाने का प्रयत्न किया जाता है। साथ ही मरीज की सोच व क्रियाकलापों को सकारात्मक रुख देने की कोशिश की जाती है।

जिन मरीजों को दवाओं से किसी प्रकार की एलर्जी है, जिन पर ‘मूड स्टेबलाइजर’ बेअसर रहे अथवा जब बीमारी चरम पर हो, ऐसे में मरीज को मॉडिफाइड इलेक्ट्रो कन्वल्सिव थेरेपी दी जाती है जो उपरोक्त हालात में लाभकारी एवं सुरक्षित है। वास्तव में यह मानसिक रोग उचित देखरेख, नियमित काउंसलिंग एवं सही दवाओं के प्रयोग से काबू में लाया जा सकता है।

रोजमर्रा की छोटी-बड़ी झुँझलाहटें, कमरतोड़ काम, नींद न पूरी होने से अशांत मन, अंदर दम तोड़ रही आकांक्षाएं, इच्छा, मानसिक द्वंद्व, नौकरी, खुद को कामयाब साबित करते रहने की कवायद, और न जाने क्या-क्या! लेकिन जब यही तनाव तन-मन से प्रकट होने लगे तो समझ लें कि अब इसे नजरअंदाज करते रहना ठीक नहीं। तनाव के संकेत हमारी भाव-भंगिमा, आचरण और व्यवहार में साफ पढ़े जा सकते हैं। जरूरत सिर्फ बॉडी लेंग्वेज की इस लिपि को समझने की है, ताकि लाइफस्टाइल में सुधार लाए जा सके।

भाव-भंगिमा से झलकता तनाव : माथे पर खिंची रेखाएं, भिंचे दांत, खिंचा जबड़ा, भिंचे-झुके कंधे, सिर के बाल तोड़ना-मरोड़ना, तनी मुट्ठियां, नाखून काटना, पैरों की लगातार थाप, आगे बंधी-तनी बांहें, खिंचा हुआ पेट, गर्दन, कंधों, सिर और पीठ की पेशियों में ऐंठन, दिल की धड़कन बढ़ना, मुंह सूखना - ये सभी भीतरी तनाव के लक्षण हैं। 

व्यवहार-आचरण में परिवर्तन : छोटी-छोटी बातों पर खीझ आने लगे, मन एकाग्रचित्त न हो सके, बेचैन रहे, जरा-सा शोर भी असहनीय मालूम दे, स्वभाव में चिड़चिड़ापन दिखने लगे, बिला वजह गुस्सा आने लगे, ठीक से नींद न आए, उदासी-अवसाद घिर आएं तो जान लें कि अब तनाव की जमुना में बाढ़ आ चुकी है, डूबने से बचना है तो मन की शांति के लिए उपाय जरूरी हैं।

तनाव-प्रेरक व्यक्तित्व रोग का घर : व्यक्तित्व में चार प्रकार की खामियां तनाव को बढ़ावा देती हैं-एक, हमेशा हड़बड़ाहट में रहना; दो, बेहद उग्र और विद्वेषपूर्ण रवैया, जिसकी जड़ें तीव्र प्रतिस्पर्धा में जन्म लेती हैं; तीन, पॉलीफेसिक बिहेवियर, जिसमें आदमी सीमा से अधिक काम हाथ में ले लेता है। नतीजतन कोई भी काम पूरा नहीं होता। चार, अव्यावहारिक उच्चाकांक्षाएं, जो सुविचारित योजना के अभाव में पूरी नहीं हो पातीं। इससे समय, पैसा, मेहनत सभी बेकार जाते हैं।

तनाव से उबरें : तनाव लंबे समय तक हावी रहे तो तो यह हानिकारक होता है। थकान रहती है। धमनियों का लचीलापन घटने से उच्च रक्तचाप, दिल का दौरा और पक्षाघात की स्थितियां बन सकती हैं। तनाव के ऐसे तमाम लक्षणों से दूर रहने के लिए थैरेपी और योग कारगर साबित होते हैं। कई प्राकृतिक चिकित्सा विधियों के द्वारा भी तनाव पर काबू पाया जा सकता है।

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