class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बदनाम करने वालों से जजों को बचाना जरूरी

यह कदम गैरसरकारी संगठन तथा आरटीआई कार्यकर्ताओं की मुहिम ही थी जो आखिरकार रंग लाई और देश की सर्वोच्च अदालत के जज अपनी संपत्ति की घोषणा करने को विवश हो गए। इस फैसले के पीछे संसद में जजों की संपत्ति पर आए बिल का पिटना भी एक प्रमुख वजह रही। लेकिन असल प्रेरणा हाईकोर्ट के जजों से मिली, जिन्होंने आगे बढ़कर नज़ीर स्थापित की और अपनी संपत्ति को सार्वजनिक कर उसे वेबसाइट पर पोस्ट कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी अगले ही दिन बैठक कर संपत्ति सार्वजनिक करने फैसला कर लिया। संपत्ति की घोषणा करने का ऐतिहासिक फैसला लेने के दो दिन बाद मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के. जी. बालकृष्णन ने पहली बार मीडिया से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि यह फैसला बदले हुए हालात में लेना पड़ा, लेकिन उन्हें अब भी शक है कि संपत्ति की सूचनाओं को लेकर लोग जजों को परेशान कर सकते हैं। इस मौके पर उनसे रू-ब-रू हुए विशेष संवाददाता श्याम सुमन।

यह कहने के बावजूद कि संपत्ति सार्वजनिक करने का कोई कानून नहीं है, आपने जजों की संपत्ति को सार्वजनिक करने का फैसला ले लिया?
बदले हालात में यह फैसला लेना पड़ा है, लेकिन मैं अब भी आश्वस्त नहीं हूँ कि लोग जजों की संपत्ति की सूचनाओं का दुरुपयोग नहीं करेंगे। अमेरिका में जजों को संपत्ति सार्वजनिक करने से पूर्ण छूट प्राप्त है।
क्या आप अब भी कहेंगे कि संपत्ति घोषणा पर कानून होना चाहिए?
बिल्कुल होना चाहिए, आखिर जजों को ऐसे लोगों से बचाना है, जो झूठी शिकायतें कर उन्हें बदनाम कर सकते हैं। सरकार यदि इस पर कानून बनाएगी तो उसका अक्षरश: पालन किया जाएगा।
आपके सर्वसम्मत प्रस्ताव में और क्या कहा गया है?
देखिए यह प्रस्ताव 1997 के प्रस्ताव के अनुरूप ही है। इस प्रस्ताव के तहत संपत्ति की घोषणा जज पहले भी करते रहे हैं फर्क बस इतना था कि वह ब्योरा मेरे पास ही रहता था। अब इसे सार्वजनिक करने का फैसला लिया गया है।
वेबसाइट पर डाले गए ब्योरे क्या होगें और क्या इसे जज की प्रोफाइल के साथ प्रकाशित किया जाएगा?
ब्योरे में जज और उन पर निर्भर परिजनों की अचल संपत्ति और निवेश का ब्योरा होगा। इस ब्योरे में उनके पति या पत्नी की संपत्ति का ब्योरा नहीं होगा। इसे प्रोफाइल के साथ रखा जाएगा या नहीं इस पर फैसला तभी होगा, जब प्रस्ताव पर सभी 24 जज दस्तखत कर देंगे। इसमें एक माह या अधिक समय लग सकता है।
संपत्ति की घोषणा के बाद क्या दिल्ली हाईकोर्ट में सीईसी (केंद्रीय सूचना आयुक्त) के फैसले के खिलाफ अपील व्यर्थ नहीं हो जाएगी?
देखिए, यह एक अलग मामला है। इस मामले में सीआईसी का आदेश गंभीर रूप से गलत था। वह यह आदेश कैसे दे सकते हैं कि गोपनीय फाइलें रजिस्टार को दी जाएं। क्या प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति से जजों की नियुक्ति के संबंध में किया गया कोलेजियम का पत्राचार सार्वजनिक किया जा सकता है? क्या सुरक्षित फैसले का कच्चा प्रारूप सार्वजनिक किया जा सकता है? लेकिन सीईसी का फैसला इन्हें सार्वजनिक करने के लिए कह रहा था।
मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई एक्ट के दायरे से बाहर मानते हैं या सिर्फ कुछ दस्तोवजों को ?
यह बहस का विषय है, लेकिन सीआईसी का फैसला बेहद गंभीर था।
संपत्ति घोषित करने के सर्वसम्मत प्रस्ताव को हाईकोर्टों पर लागू करवाएंगे?
सबसे पहली बात यह है कि यह प्रस्ताव सिर्फ सुप्रीम कोर्ट जजों से संबंधित है। हाईकोर्ट पूर्णत: स्वायत्त निकाय होते हैं, उन पर सुप्रीम कोर्ट का सुपरवाइजरी नियंत्रण नहीं होता। इससे पूर्व 1997 का प्रस्ताव भी उन्हें भेजा गया था, लेकिन एक दो को छोड़ किसी ने इसका पालन नहीं किया। उन्हें बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के संपत्ति का ब्योरा वेबसाइट पर डालने के फैसले के बाद दिल्ली हाईकोर्ट भी सक्रिय हो गया है। हाईकोर्ट के जज आज (शुक्रवार) जज फुलकोर्ट मीटिंग में संपत्ति की घोषणा पर फैसला लेने वाले हैं (खबर लिखे जाने तक देर शाम दिल्ली और केरल हाईकोर्टों ने एक प्रस्ताव पारित कर संपत्ति सार्वजनिक करने के उपाए करने की घोषणा कर दी)।
सार्वजनिक किए गए संपत्ति के ब्योरे को लेकर सवालों का जवाब दिया जाएगा?
इस मुद्दे पर विचार नहीं किया गया है।
महिला जजों को सुप्रीम कोर्ट में लाने के मसले पर क्या कहेंगे ?
यह फैसला हाउस आफ लार्डस (कोलेजियम) करेगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बदनाम करने वालों से जजों को बचाना जरूरी