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न्याय का विवेक

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपनी संपत्ति की घोषणा करने का जो फैसला किया है, वह अपने आप में स्वागत योग्य तो है ही, उसका महत्व यह भी है कि न्यायिक सुधारों की दिशा में वह एक ऐसी खिड़की खोलता है, जिससे और ज्यादा रोशनी की उम्मीद की जा सकती है। इससे मालूम होता है कि न्यायपालिका में यथास्थिति की ताकतें जितनी मजबूत हों, उसमें परिवर्तन और सुधार चाहने वाले भी बहुत हैं और इससे सुधार का सही तरीका भी पता चलता है।

जब लोकसभा में इससे संबंधित विधेयक वापस लेना पड़ा था, तब यह लग रहा था कि न्यायपालिका में जनता के प्रति जवाबदेही लाने की कोशिश काफी वक्त के लिए टल गई हैं। लेकिन उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों ने अपनी ओर से पहल की और देखते-देखते  सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों में इसके लिए आम सहमति बन गई। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि यह आम सहमति और ज्यादा सुधारों के लिए एक नई शुरुआत होगी। भारतीय लोकतंत्र जैसे-जैसे परिपक्व हो रहा है, वैसे-वैसे नए वक्त में प्रासंगिकता और आम जनता की बढ़ती हुई आकांक्षाओं के मद्देनजर लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं में बदलाव की मांग तेज हो रही है।

इक्कीसवीं शताब्दी में ऐसी संस्थाएं नहीं चल सकतीं जो उन्नीसवीं शताब्दी के अंदाज में चले। यह परिवर्तन जरूरी है, लेकिन न्यायपालिका के मामले में सावधानी भी बरतना जरूरी है, क्योंकि ऐसा भी नहीं हो कि न्यायपालिका की स्वायत्तता और निष्पक्षता खतरे में पड़ जाए।

साथ ही यह भी जरूरी है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता और समाज के बदलते रूप के साथ प्रासंगिकता भी बनी रहे। इसलिए यह अच्छा होगा कि इस बदलाव और सुधार पर समाज के सभी वर्ग बहस-मुबाहिसा करें, लेकिन बदलाव के स्वरूप को लेकर पहल न्यायपालिका के अंदर से ही हो। यह जानना अच्छा लगता है कि इस संदेह और अविश्वास के दौर में भी ऐसे न्यायाधीश कम नहीं है, जो न्यायपालिका की साख बनाए रखने के लिए सोचते हैं और प्रयत्नशील भी हैं। अगर ऐसे न्यायाधीश और ज्यादा प्रभाव बनाएं तो न्यायपालिका में और सुधार हो सकते हैं, क्योंकि न्यायप्रक्रिया जिस कदर उलझी हुई और लंबी हो गई है, उससे आम जनता जल्दी न्याय पाने की उम्मीद नहीं कर सकती। यह फैसला उम्मीद पैदा करता है कि न्यायपालिका अतीत का बोझ उतार कर भविष्य की तरफ देखने को तैयार है।

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