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आतंक की हद

मंगलवार को उड़ीसा से पंजाब तक घटी आतंकी घटनाओं में कोई तालमेल भले न रहा हो, लेकिन उन्हें एक साथ रख कर देखा जाए तो हमारी जमीन पर चल रहे आतंकवाद की मुकम्मल तस्वीर बनती है। अगर उड़ीसा, झारखंड और बिहार में माओवादी हिंसक गतिविधियों ने रेलवे की संपत्तियों और दूसरी व्यापारिक गतिविधियों को निशाना बनाया तो लुधियाना रेलवे स्टेशन पर बब्बर खासला के आतंकी ने एक की जान लेकर कुछ लोगों को घायल कर दिया। इस बीच महाराष्ट्र में विस्फोट करने जा रहे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी की नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तारी, तीसरे और सबसे खतरनाक आतंकी आयाम की ओर संकेत करती है। इसमें बब्बर खालसा यानी सिख आतंकवाद के खतरे को नगण्य मान लें तो भी माओवाद और इस्लामी आतंकवाद के खतरे को बड़ी चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। पूर्वी भारत के जिन राज्यों में माओवादियों ने 48 घंटे के बंद का आह्वान किया था, वहां के कुछ इलाकों में वे समांतर सत्ता चला रहे हैं। इसीलिए बंगाल में सक्रियता दिखा कर लौट रहे अपने दो साथियों की रांची में गिरफ्तारी पर उन्होंने पटरियों पर विस्फोट करने, स्टेशन फूंकने और ट्रक जलाने तक की वारदातें कर डालीं।

वे माने तभी जब यह आश्वासन दिया गया कि गिरफ्तार किए गए उनके साथियों को अदालत में पेश किया जएगा, क्योंकि उन्हें मुठभेड़ में मारे जाने का डर था। माओवाद ग्रामीण आतंकवाद है, जिसका एक हिस्सा छापामार युद्ध का है तो दूसरा हिस्सा सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का है। कहीं इन दोनों में संबंध होता है तो कहीं वे असंबद्ध होते हैं। उनकी इस संरचना को पहचान कर ही उनसे घरेलू स्तर पर निपटा ज सकता है। इसके लिए आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए बनी उन स्थितियों को भी खत्म करना होगा, जिनसे उग्रवाद पनपता है। आतंक का दूसरा रूप लश्कर-ए-तैयबा व उसके जैसे अन्य संगठनों का है। यह वैश्विक शहरी आतंकवाद है, जिसका केंद्र पाकिस्तान है। यह बात दुनिया के ज्यादातर देश ही नहीं स्वयं पाकिस्तान भी मानता है। इसके लिए राष्ट्रीय  चौकसी और चुस्ती के अलावा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है। तभी भारत के नए दस्तावेज में लश्कर के संस्थापक हाफिज सईद से पूछताछ के लिए पाकिस्तान पर कड़ा दबाव डाला गया है। आतंक की इन भीतरी और बाहरी ताकतों से छिड़ी यह लड़ाई जटिल जरूर है, पर भारत के लिए इसे जीतना असंभव नहीं है।

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