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कम से कम दवा तो सस्ती करे सरकार

मैं 69 वर्षीय मधुमेह, हाई ब्लडप्रेशर और अनेक बीमारियों से पीड़ित व्यक्ति हूं। बाजार से कम कीमत वाली अच्छी दवाइयां हमेशा गायब रहती हैं। साधारण से साधारण विटामिन्स तक नदारद हैं। अन्य सस्ती दवाइयों का भी यही हाल है। ये बात नहीं है कि इनके सब्सिटच्यूट नहीं हैं। ‘सी’ जेड के साथ है 30 रुपए का। ‘ई’ है कई अन्य चीजों के साथ 60 रुपए का। कैमिस्ट रोज का है पहचान का है। मैंने पूछा क्या साल्ट नहीं मिल रहे हैं जो कम्पनी बना नहीं रही है। वह बताता है कि यह सब सरकार की और मंत्रियों की गलत नीतियों के कारण हो रहा है। सरकार सोचे और तुरंत दवाइयां सस्ती हर केमिस्ट के यहां उपलब्ध कराए।
यू. सी. पाण्डेय, द्वारका, नई दिल्ली

आतंकियों को कुचलना जरूरी
आतंकवादी हमलों से निपटने का देश में आज तक कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा सका है। हालांकि मुंबई हमले के बाद से देश में कोई बड़ी आतंकवादी वारदात नहीं हुई है। हाल ही में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने देश की जनता को यह तथ्य याद दिलाकर अपनी पीठ भी ठोकी। लेकिन गृहमंत्री ऐसा करते समय यह भूल गये कि जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती और भीतरी इलाकों में आतंकवादियों की हलचल में हाल में फिर तेजी आई है। आतंकवादियों की घुसपैठ अब भी जारी है। सुरक्षा बलों से उनकी आये दिन मुठभेड़ यही जताती है कि आतंक के सर्प का फन अभी कुचला नहीं ज सका है। आतंकवाद को कुचलने के लिये पाक सीमा में स्थित आतंकवादी कैंपों को ध्वस्त किया जाना जरूरी है। तमाम आतंकी हमले ङोलने के बावजूद भारत यह काम नहीं कर सका। ऐसे में देश पर से आतंक का काला साया मिटाना इतना आसान नहीं है। आतंकवादियों पर हमें आक्रामक होकर प्रहार करना चाहिए। ऐसा करने में अगर कोई देश रोड़ा बने तो हमें उसे भी नहीं बख्शना चाहिए।

कौशल अग्रवाल, मोहाली

सच्ची श्रद्धांजलि

कारगिल युद्ध के 10 वर्ष पूरे होने पर देशभर में शहीदों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। राष्ट्र ने विजय की खुशी मनाई, किन्तु श्रद्धांजलि का यह सिलसिला उस समय महज औपचारिकता सा लगने लगता है, जब मीडिया के माध्यम से शहीदों की बहुत सारी उपेक्षित माताओं द्वारा दुखी जीवन जीने की बातें सुनने को मिलती हैं। ऐसे कई ज्वलंत प्रमाण हैं समाचारपत्रों में प्रकाशित शहीदों की माताओं के जिसमें उनकी जीवन पर्यंत दुखद पीड़ा साफ झलकती है, लेकिन समाधान के लिए सरकार का गंभीर न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। मानवता के आधार पर केंद्र सरकार ऐसा कानून क्यों नहीं बना सकी, जिसमें जन्मदात्री एवं पालन पोषण करने वाली मां को भी जीवन पर्यंत बेटे की शहादत का समुचित सम्मान प्राप्त हो सके।
खुशहाल सिंह बिष्ट, देहरादून

अपना घर
शाहरुख भाई!
अपना घर जो मर्जी कर
दूसरे का घर थूकने को भी डर।
वीरेन कल्याणी, शाहदरा, दिल्ली

दिल्ली दिलवाली
कभी होती थी दिल्ली दिलवाली
आज मुंह चिकना और पेट खाली
हे भगवान आप ही करें रखवाली
ये सरकार नहीं कुछ करने वाली
वेद, मामूरपुर, नरेला, दिल्ली

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