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लड़ते क्यों हैं भाई-भाई

ईर्ष्या बहुत स्वाभाविक मनोभाव है, लेकिन जब ये भाई-बहनों के बीच शुरू हो जाता है तब स्थिति बड़ी विकट हो जाती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘सिबलिंग राइवलरी’ कहा जाता है। आजकल अंबानी भाइयों के बीच गैस को लेकर चल रहा विवाद इसी का एक उदाहरण माना जा सकता है। इस मनोवैज्ञानिक समस्या का विश्लेषण कर रही हैं मीनाक्षी

‘मेरे पास अपने उस बड़े भाई के  खिलाफ अदालत में जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है, जिसकी मैं अपने माता-पिता के बाद सबसे ज्यादा इज्जत करता आया हूं।’ उद्योगपति अनिल अंबानी के इस बयान ने पिछले दिनों सामान्य लोगों का भी ध्यान आकृष्ट किया। ज्यादातर लोग बॉलीवुड की फिल्म की तरह उनके बारे में सुनना चाहते हैं। वहीं इस विवाद ने उस पुराने सवाल को भी जिंदा कर दिया कि सिबलिंग राइवलरी (भाई-भाई, बहन-बहन या भाई-बहन के बीच प्रतिद्वंद्विता) किस हद तक जा सकती है।

मनोविश्लेषकों की मानें तो ऐसी स्थिति तब आती है जब व्यक्ति अपने को अकेला महसूस करे, किसी प्रिय चीज के खोने का डर सताता हो (मसलन कारोबार, पावर खत्म होने, किसी प्रिय से बिछड़ने का खौफ आदि), उसे लगता है कि लोगों के बीच वह हमेशा की तरह पॉपुलर रहे। ऐसे में जब उसका अपना भाई-बहन बाजी मारने लगे तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसके मन में बचपन से दबी ईर्ष्या की भावना कई तरह रूप में सामने आती है। कभी एक-दूसरे पर आरोप लगाकर या कभी लड़ाई-झगड़ा करके अपनी भड़ास निकालते हैं। इसी का एक उदाहरण है प्रमोद महाजन का भाई प्रवीण। दूसरी तरफ मफतलाल कंपनी के मालिक स्व योगेन्द्र की दो पुत्रियों में भी राइवलरी देखी गई है। प्रॉपर्टी पाने के लालच में उनकी बेटी अपर्णा ने तो अपना सेक्स ही बदल लिया था।

रिश्तों की परिभाषा
भाई-बहनों में थोड़ी बहुत जलन होना तो स्वाभाविक ही है। यह कहना है वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. दिव्या प्रसाद का। आधुनिक समय में रिश्तों की परिभाषा बदल चुकी है। जबकि हमारे धार्मिक ग्रंथों (रामायण) में बड़े भाई को सवरेपरि रखा जाता था। परिवार में बड़े भाई की बात कानून की तरह मानी जाती थी। लक्ष्मण और भरत इसका साक्षात प्रमाण हैं, जबकि महाभारत में लालच की वजह से भाइयों (कौरव और पांडवों) में हिंसा का रूप सामने आई। आज के समय में महाभारत की तरह अपने स्वार्थो को लेकर भाइयों-बहनों में ईर्ष्या, लड़ाई-झगड़ा देखने को मिल रहा है। हालांकि पुराने समय से जमीन-जायदाद को लेकर भाइयों में झगड़ा होता था। इस थीम को लेकर कई फिल्में भी बनी हैं जैसे दीवार, वक्त, राम-लखन, कमीने आदि।

कारण और निवारण
दो बच्चों के बीच तुलना करके माता-पिता ही बच्चे में जलन पैदा करते हैं। दूसरे बच्चे के आने की खुशी सबसे ज्यादा पहले बच्चे को ही होती है क्योंकि उसके लिए यह निराला अनुभव होता है। वह नए बच्चे से प्यार भी करता है, पर जब सबका ध्यान दूसरे बच्चे की तरफ ज्यादा होता है तो उसे असुरक्षा का भाव सताने लगता है। तब पहला बच्चा खुद को अकेला महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि उसका हक उससे छिन गया है, जैसे उसका कमरा, खिलौने, मम्मी की गोद आदि। जलन की वजह से वह दूसरे बच्चे के साथ अजीब-अजीब हरकतें करने लगता है। मसलन उसे अकेले में मारना, डराना, उसका काम बिगाड़ना, अपने से आगे निकलने न देना आदि।

यदि माता-पिता बचपन की इस ईर्ष्या को सही ढंग से संभालने में नाकाम रहते हैं, तो आगे चलकर इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं। आप बच्चे में ईर्ष्या और दूसरों से श्रेष्ठ होने का भाव जैसी सोच को अलग नहीं कर सकते। कई बार ऐसा समय भी आता है जब आपको अपना प्रिय भी बुरा लगने लगता है।

ज्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि दो भाइयों या दो बहनों की तुलना में भाई-बहन के रिश्ते में सिबलिंग राइवलरी की भावना कम होती है। प्राकृतिक तौर पर भी भाई और बहन का व्यक्तित्व अलग होता है, उनके शौक, इच्छाएं काम करने के तरीके अलग होते हैं।

इसी वजह से भाई-बहन के बीच तुलना कम होती है, जबकि दो बहनों के बीच तुलना अधिक होती है कि देखों बड़ी कितनी मुंहफट है और छोटी उतनी है सलीकेदार।  इसी तरह दो भाइयों के बीच भी तुलना करते हुए कहा जाता है कि एक पढ़ाई-लिखाई में कितना तेज और दूसरे को खेलने से फुर्सत नहीं है। बचपन में की गई इस तरह की तुलना से भाइयों और बहनों के बीच एक-दूसरे के प्रति प्रतिद्वंद्वी बनने की भावना पनपने लगती है और कई बार दूरियां आ जाती हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उनमें ईर्ष्या बढ़ती जाती है। जबकि भाई-बहन के शौक अलग-अलग होते हैं। उनमें कपड़े किताबें, खिलौनों को लेकर भी कम झगड़े होते हैं, इसलिए उनके बीच संबंध मधुर रहते हैं।

बचपन की सावधानी ईर्ष्या से बचाए

मनोचिकित्सक कहते हैं कि जब घर में नन्हा मेहमान आए तो जरूरी है कि बड़े बच्चे के साथ बहुत ही प्यार व समझदारी से पेश आएं, ताकि उसको यह न लगे कि उसका प्यार उससे छिन रहा है। ऐसा न हो इसके लिए बहुत जरूरी है कि कुछ बातों का ध्यान रखें, वो कैसे आइए जानें :-

-सबसे पहले आप बड़े बच्चे को पहले ही शिशु से परिचित करा दें। उसे बता दें कि आप एक छोटा-सा बेबी लाने वाली हैं।

-जब आपके गर्भ में शिशु पैर चला रहा हो तो बड़े बच्चे का हाथ गर्भ के ऊपर रखकर उससे कहें कि वह छोटे को हलो कहे।

-अगर शिशु को स्तनपान कराते समय बड़ा बच्चा भी स्तनपान की जिद्द करे तो उसे भी करने दें।

-कई बार देखने में आता है कि बड़ा बच्चा अनायास ही शिशु को मारने या नोचने लगता है। अगर वह ऐसा करे तो ज्यादा नुकसान होने से पहले हटा दें। शिशु को मारने-नोचने पर उसे सजा देकर बात का बतंगड़ न बनाएं।

-उसे व्यस्त रखने के लिए जरूरी है कि कुछ काम उसे भी करने दें। जैसे अपने कपड़ों की तह लगाना, जूते-चप्पल जगह पर रखना, या किसी की मदद लेना। ऐसा करने पर बच्चे को आपका साथ भी मिलेगा और वह कामकाज में भी मदद करेगा। हां, इस बीच उसे शाबासी जरूर दीजिए ताकि उसे लगे कि अभी भी उसका महत्व है और वह मम्मी की मदद कर रहा है।

-बच्चे को उसकी गलती पर डांटने के बजाए प्यार से समझएं, क्योंकि बच्चे को प्यार करने की सबसे ज्यादा जरूरत उस वक्त होती है, जब वह प्यार करने लायक बिल्कुल नहीं हो। आपके व्यवहार से बच्चे को स्पष्ट हो जाएगा कि गलती करने की उसे इजाजत नहीं है, लेकिन उसे अब भी उतना ही प्यार किया जाता है जितना पहले।

-बड़े बच्चे को प्रोत्साहित करें कि वह नन्हे के लिए कोई उपहार बनाए या खरीदे ताकि उसको लगे कि जो भी आ रहा है, वह उसका अपना ही है।

-अस्पताल में ऐसी व्यवस्था अवश्य करें कि प्रसव के बाद बड़ा बच्चा अस्पताल में आपसे और नए बेबी से मिलने आ सके।

-जब बड़ा बच्चा अस्पताल देखने आए तो नवजात से ध्यान हटाकर बड़े बच्चे को लाड़ करें, ताकि उसे लगे कि आप उसे प्यार करती हैं।

-नवजत शिशु से बड़े बच्चे को मिलवाएं। अगर वह उसे प्यार करना व गोद में लेना चाहे तो डॉक्टर से पूछकर उसे प्यार करने दें ताकि इनफेक्शन का खतरा न हो।

-अपने कमरे में बड़े बच्चे का फ्रेम किया हुआ फोटो लगाएं। इससे उसको बहुत खुशी होगी।

-शिशु को कपड़े पहनाने व बदलने जैसे कामों में बड़े बच्चे की मदद लें।

-कुछ ईर्ष्या भाव तो स्वाभविक और संभावित होते हैं, लेकिन हमें इसके प्रति संवेदनशील होकर इसे सही ढंग से संभालना चाहिए।

-ध्यान रखें कि बच्चों का अपनी चीज पर पूरा हक हो। अगर उन्हें यह नहीं पता होगा कि वह चीज किसकी है तो उन्हें उसे बांटने में असुरक्षा महसूस होगी। उन्हें पूरी इजजत दें कि यदि वे चाहें तो अपनी चीज किसी से न बांटें।

-अगर बच्चा कोई चीज बांटना नहीं चाहता तो उसे साफ शब्दों में कहें कि उसके खेलने के बाद भइया या बहन उस खिलौने से खेलेंगे। बच्चों को पता हो कि कोई दूसरा भी उस खिलौने के इंतजार में है। बच्चे से उसी समय खिलौना या वस्तु छीनने को जिद्द न करे।

-एक जैसा दिखने वाली वस्तुओं पर झगड़ा न हो, इसके लिए उन्हें अलग-अलग रंग में लें व बच्चों को उनका रंग भी बता दें।

-अगर बड़ा बच्चा किसी से कुछ बांटना न चाहे तो उसे स्वार्थी नाम न दें। आप स्वयं बांट कर खाएं-पिएं, बच्चे आपको देखकर ही सीखेंगे।

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