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राहत-ए-जम-जम

फत्ते मियां भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह गिरते-हांफते बीमार दोस्त छेदीलाल की चौखट पर जा धमके। कलेजा मुंह को आ रहा था लेकिनबात ही कुछ ऐसी थी। दूर से ही विपक्षी नेता की तरह चिल्लाए, छेदी ओ छेदी। ले बेटा, तेरे तो बुरे दिन कट गए। खाट पर उकड़ू बैठ छेदी फुसफुसाया, अरे कुछ उगल तो सही। फत्ते ढांढस बंधाने के अंदाज में बोला, सरकार ने सूखा राहत की घोषणा कर दी है। बस कभी भी यहां पहुंच सकती है। तेरा जिला सूखा घोषित हो गया है, क्योंकि यहां 50 फीसदी से कम बारिश हुई है। सो तेरा तो जुगाड़ हो गया। फिर योगी बाबा की तरह जोर की सांस खींचकर बोला, लेकिन छेदी, यार हम बस 0.5 अंक से पिछड़ गए। ऊपर वाले को शायद यही मंजूर था। बस इत्ती सी कम बारिश होती तो थोड़ी बहुत राहत हमारी झोली में आ जाती। भाग्य अपना-अपना। अब बारिश तो जात-पात, धर्म-कर्म या सरहद देखकर आती नहीं।
यह सुन छेदी को मानो करंट लग गया हो। राखी सावंत के अंदाज में भड़क उठा। बोला, राहत गई तेल लेने। यहां जान को अटकी है और तुझे मजाक सूझ रहा। अरे चारा बचा नहीं। बोई फसल को सूखा गटक गया। दवाई तक के लाले हैं। तू तो ऐसे खुश हो रहा है, जैसे रियलिटी शो के अभिनेता कि जंगल पहुंचे नहीं और मिल गए पचास लाख। सरकारी फरमान ही तो जारी हुआ है ना। अब देखना पहले स्टेट घोषणा करेगा। डीएम अधिकारियों को दौड़ाएगा। अधिकारी गांव-गांव दौरा कर रिपोर्ट लिखेंगे। रिपोर्ट स्टेट हेडक्वार्टर जाएगी वहां से केंद्र। बैठकों का दौर चलेगा, पैसा रिलीज होगा फिर उसी चैनल से वापस आएगा। कितना और कब पहुंचेगा यह तो पहुंचाने वाला भी नहीं जानता। तब तक तो मियां दिवाला निकल चुका होगा। और फत्ते मियां पिछले सूखे का मंजर तो देख चुके हो। बैंक एकाउंट के लिए 100 का नोट चाहिए और राहत का चेक आया था 17, 50 व 70 रुपए का।
सरकार बनाने में की गई तिकड़म का गणित हमेशा नेता सही लगाते हैं लेकिन राहत के गणित में उनकी याददाश्त शायद घास चरने चलीजाती है। जब संकट खुद पर आए तो संसद तक में जूते उछालने से नहीं चूकते। अब स्वाइन फ्लू को ही देख लो। अमीर की बीमारी है, सो सरकार सिर के बल दिन-रात टिटहरी बन खड़ी है। बाढ़ और हर साल बारिश के बाद ऐसे इलाकों में दिमागी बुखार और हैजे से सैकड़ों लोग और बच्चे मरते हैं, उस पर कोई शोर-शराबा नहीं होता। लेकिन घबराओ नहीं दोस्त, हिसाब तो सभी को यहीं देना होता है।

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