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सलाख़ों से बड़ी शख्सियत

संकट के समय देश की आम जनता जिन विप्लवी लेखकों से मार्गदर्शन की उम्मीद करती है, उनमें वरवर राव प्रमुख हैं। वे चार दशकों से जिस अडिग विश्वास और जज्बे के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में शिरकत कर रहे हैं, वह विरल व विलक्षण है। यह विलक्षणता ही उन्हें महान योद्घा बनाती है। बार-बार जेल में कैद होने व प्रतिबंधों के बावजूद उनका यह जज्बा कम नहीं किया जा सका। इसीलिए उनका व्यक्तित्व जेल के सीखचों से बड़ा हो गया। वरवर पहली बार 1973 में जेल भेजे गए। रामनगर षड्यंत्र केस में टाडा कानून के तहत वे 26 दिसंबर 1985 से 23 मार्च 1989 तक सिकंदराबाद जेल में कैद रहे।

क्रांतिकारी लेखक संघ की स्थापना में वरवर की केंद्रीय भूमिका थी, उसे प्रतिबंधित करने के बाद वरवर को हैदराबाद सेंट्रल जेल में साढ़े सात महीने जेल में रखा गया। कारागार के एकांतवास के उन कठिन दिनों में वे सुबह उठने से लेकर रात नौ बजे तक के राउंड के समय वहां टहलते और रात में लॉक-अप में सन्नाटा पसर जाने के बाद घंटों चिंतन-मनन करते तथा यादों व कल्पनाओं में खोए रहते। वरवर ने अपनी जेल डायरी में लिखा है कि कारागार की चारदिवारी के बीच कल्पनाओं और स्वप्नों को रिकॉर्ड करनेवाला कोई आधुनिक तकनीकी यंत्र होता तो कितना अच्छा होता? जेल के भयावह एकांतवास में स्वप्न और कल्पना ही वरवर के सहचर थे। वरवर लिखते हैं- ये रात के सपने/ न अपने, न कपोलकेंद्रित हैं/ स्वाधीन भी नहीं होते/ इन कल्पनाओं स्वप्नों की मनोयात्रा में/ थोड़ी देर ट्रैक में रहने जैसा ही रहता हूं।
कोई सत्ता किसी व्यक्ति को तो कैद कर सकती है, पर उसकी कल्पना व स्वप्न को कैद नहीं किया जा सकता। विचार को कैद नहीं किया जा सकता। वरवर का सपना क्या है?
मनुष्य सपना अकेले देखता है, पर वरवर के अकेले देखे गए स्वप्न में वह जानता है, जिसे व्यवस्था ने शोषण, दोहन-दमन-उत्पीड़न का शिकार बनाया है। वरवर कहते हैं-वे दिन भी आएंगे/रक्त सूर्य रश्मियों की सुगंध बन जाएगा/ आंसुओं के पटल पर इंद्रधनुष होगा श्यमान/ यादों का संचयन इतिहास बन जाएगा/ मुश्किलें जन विजय गाथा की स्मृति बन जाएंगी। वरवर को पढ़ते व गुनते हुए मुझे बार-बार नेल्सन मंडेला याद आते हैं। दोनों की मुट्ठी में जलता लोहा रहा और हथौड़ी के प्रहार भी उन्होंने सहे। दोनों का गंतव्य स्वाधीनता है।
वरवर मानते हैं कि मनुष्यता से मनुष्य के दूर होने की स्थिति ही गुलामी है। इसी के खिलाफ मंडेला से लेकर वरवर जैसे योद्घा लड़ते हैं। यह लड़ाई इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था मनुष्य को स्वाधीनता से दूर रखने की लगातार साजिश में संलग्न रही है। जनता का तीव्र रक्त शोषण करने वालों का वह साथ देती है और मानवता का परित्याग करती है। अभी लालगढ़ में हमने देखा कि किस तरह मानवता का मौजूदा व्यवस्था ने परित्याग किया।
अर्ध सैनिक बलों व बंगाल पुलिस ने लालगढ़ ऑपरेशन के दौरान वहां आदिवासी गांवों में पेयजल के एक मात्र स्रोत कुंओं में शौच कर क्या मानवता की हत्या नहीं की गई? लालगढ़ में गरीबी उन्मूलन को लक्ष्य बनाना चाहिए था या माओवादियों को निशाना बनाना चाहिए था?
स्वाधीनता का ऐसा हरण किए जाने के खिलाफ ही मंडेला से लेकर वरवर संग्राम चलाते हैं। मंडेला के बारे में वरवर की कविता है-राजनीतिक कैदी की चेतना हो तुम, परिभाषा हो, कैदी को धिक्कारने की स्वतंत्रता के प्रतीक हो तुम, स्वतंत्रता माने क्रांति कह रहे हो तुम।
मुझे लगता है कि वरवर पर भी ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। इस क्रांति के लिए जिस चेतना की दरकार होती है, वह वरवर में कूट-कूटकर भरी है। कोलकाता में एक बार गदर मेरे घर आए थे और बता रहे थे कि किस तरह वरवर अपने विचारों पर अडिग रहते हैं और सहयात्रियों की सलाह पूरी तरह मानते हैं और कभी भी साथियों में कोई वैचारिक स्खलन नहीं आने देते।
नक्सल आंदोलन की आरंभिक प्रेरणाओं व प्रतिज्ञाओं से उपजी वरवर की राजनीतिक विचारधारा में उनका पूरा परिवार शरीक रहा है। उनकी पत्नी हेमा उनके संघर्षों में आरंभ से डटी रही हैं तो पुत्रियों ने भी क्रांतिकारी बालक संघ बनाकर योगदान किया। वरवर के पूरे परिवार के इस साहस के समक्ष कौन नमन नहीं करेगा? वरवर परिवार, उनके अनेकानेक साथी जानते हैं कि समता के लिए उनके संग्राम का नतीजा क्या होगा?
सत्तर के दशक में मैंने बंगाल में देखा था कि नक्सली जानते थे कि वे पुलिस के देखे जाते ही मारे जाएंगे पर वे किसी से डरते नहीं थे। उनमें गजब का साहस था। नक्सलियों के नि:स्वार्थ बलिदान से कोई इंकार कर सकता है?

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