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औरतों को आवाज दी इस्मत चुगताई ने

औरतों को आवाज दी इस्मत चुगताई ने

पढ़ने वालों को अपनी कलम के मोहपाश में बांधने में महारत रखने वाली विख्यात उर्दू कहानी लेखिका इस्मत चुगताई ने समाज के पैरों तले कुचली औरत के अंदर दबी भावनाओं को शब्द दिये थे।

इस्मत ने लिहाफ में लिपटी औरत की भावनाओं को बेलाग तरीके से दुनिया के सामने उजागर किया। इस बेबाक साहित्यकार की सोच में धार थी, जो अक्सर लोगों को पसंद नहीं आती थी। फिल्मी दुनिया में भी नाम कमाने वाली इस्मत में उनके समकालीन महान कहानीकार सादत हसन मंटो की झलक देखी जाती थी।

उर्दू के उपन्यासकार डॉक्टर गजनफर की नजर में इस्मत बेहद बेबाक और भाषा के लिहाज से बेहद मजबूत लेखिका थीं। उन्होंने कहा कि इस्मत ने जिंदगी से जुड़ी उन बातों और वास्तविकताओं को सामने रखा जिनकी तरफ लोग एक करने से झिझकते थे। वह जिंदगी में तूफान पैदा करने वाली खामोश सी बातों को जाहिर करना चाहती थींं।

इस्मत चुगताई ने 1940 के दशक में लिहाफ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी। एक विवाहित लेकिन परित्यक्य पत्नी सा जीवन जी रही एक महिला की कुंठा पर आधारित इस विवादास्पद कहानी को लेकर इस्मत पर अश्लीलता फैलाने का मुकदमा भी चला था।


डॉक्टर गजनफर कहते हैं कि इस्मत ने दबी-कुचली और रूढ़ सामाजिक बंधनों से जकड़ी महिला के दर्द को एक औरत के नजरिये से देखा और उसे कागज पर उतारा। उन्होंने उन मसलों पर कलम चलाई जिन्हें दीगर साहित्यकार छूने से कतराते थे।

दूसरी ओर, लिहाफ के बारे में प्रख्यात उर्दू कहानीकार मुशर्रफ आलम जौकी की राय एकदम अलग है। उनका कहना है कि यह अफसाना बेहद कमजोर था। इस्मत बेशक एक निडर लेखिका थीं, लेकिन उनकी हिम्मत को लोगों ने एक साहित्यकार की बगावत समक्ष लिया, जो एक गलती है।

उन्होंने कहा कि इस्मत चटखारेदार भाषा की धनी थीं और उनमें तथा मंटो में कई बुनियादी फर्क भी थे। मंटो के पास जहां अपनी कहानी से लोगों को चौंकाने का हुनर था, वहीं इस्मत में यह गुण कतई नहीं था। हालांकि यह सच है कि वह बेहद आकर्षक भाषा की मालिक थींं।

उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में 15 अगस्त 1911 को जन्मीं इस्मत का ज्यादातर वक्त जोधपुर में गुजरा। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने चोरी--छुपे कहानियां लिखनी शुरू कीं। उनकी पहली लघु कथा फसादी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका साकी में प्रकाशित हुई थी।

समाज विशेषकर आधी आबादी यानी महिलाओं के मुद्दों पर पैनी नजर रखने वाली इस्मत राशिद जहां, वाजेदा तबस्सुम और कुर्रतुलऐन हैदर जैसी प्रख्यात लेखिकाओं की समकालीन थीं। इस्मत रे अनेक कथा संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें कलियां, छुई-मुई, एक बात और दो हाथ शामिल हैं। साथ ही उन्होंने टेढ़ी लकीर, जिद्दी, एक कतरा-ए-खून, दिल की दुनिया, मासूमा और बहरूपनगर शीर्षक से उपन्यास भी लिखे।

इस्मत ने वर्ष 1941 में शहीद लतीफ से शादी की। बाद में उनकी मदद से उन्होंने 12 फिल्मों की पटकथा लिखीं। उन्हें वर्ष 1975 में फिल्म गर्म हवा के लिये सर्वश्रेष्ठ कहानी का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला। उन्होंने वर्ष 1978 में श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून के संवाद लिखे। अपनी कलम की धार से सामाजिक बंधनों पर वार करने वाली इस साहित्यकार का 24 अक्टूबर 1991 को मुंबई में निधन हो गया।

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