class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

ये पंच तो परमेश्वर नहीं हैं

आधी सदी पहले नवीं या दसवीं कक्षा में कालजयी लेखक मुंशी प्रेमचंद की एक बड़ी रोचक कहानी पढ़ने का मौका मिला था। शीर्षक था ‘पंच परमेश्वर’। कहानी के क्लाइमैक्स में फैसला देने वाला पंच पक्षधरता से और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो न्यायोचित फैसला सुनाता है और इसी कारण परमेश्वर के पद को प्राप्त करता है। आज यह कहानी एक ऐसे संदर्भ में याद आ रही हैं, जो पंचायत को और पंचों को महिमा मंडित करने वाला नहीं, बल्कि उनके लिए शर्मनाक ही समझा जा सकता है। राजधानी के निकट हरियाणा में खाप पंचायतों का घनघोर जातिवादी अमानवीय और कानून के राज को चुनौती देने वाला आचरण गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। यदि एकाध घटना ऐसी घटी होती तो उसकी भर्तसना भर से शायद काम चल जाता। मगर इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति पिछले महीने में ही इतनी बार हो चुकी है कि लगता है कि एक जानलेवा महामारी फैल रही है। चुप रहना सिर्फ पीड़ित परिवारों के लिए ही नहीं, पूरे देश में कानून के राज के लिए बेहद खतरनाक होगा।

देश में ऐसे कानून लागू हैं, जो जाति के आधार पर भेदभाव बरतने और उत्पीड़न को दंडनीय अपराध करार देते हैं। इनके कारण बहुत सारे शोषित और उत्पीड़ित अब यह आशा कर सकते है कि उन्हें अमानवीय जीवन कि यंत्रणा से मुक्ति मिलेगी। अनुसूचित जातियों और जनजातियों में शुमार किए जाने वाले अनेक समुदाय आरक्षरण वाली व्यवस्था से उतने लाभान्वित नहीं हुए हैं, जितना इस कानूनी कवच से। जातिवादी अहंकार से ग्रस्त ‘सवर्ण’ सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं के आचरण पर भी इससे अंकुश लगा है। ऐसा महसूस होने लगा था कि निकट भविष्य में ही शिक्षा के प्रसार और जनतंत्र के अनुभव से हमारा समाज जाति के जहर से छुटकारा पा सकेगा। हरियाणा की खाप पंचायतों के फैसले ने इस भ्रम को दर्दनाक ढंग से चकनाचूर कर दिया है और हम सभी को इस मामले में फिर से सोचने को मजबूर भी।

सबसे पहली बात यह समझने की है कि ये पंचायतें जातिवादी संगठन है, जिनमें दकियानूस और धन-दौलत के आधार पर ताकतवर बुजुर्गो का ही बोलबाला होता है। वैसे अमीर और ताकतवर परिवारों के नौजवान भी कम बिगड़ैल और दकियानूस नहीं होते। समस्या का एक अभिन्न पहलू लिंग-भेद के आधार पर सामाजिक विषमता को मान्यता देने वाला भी है। कुटुम्ब कबीले की इज्जत के नाम पर किसी मासूम को कत्ल कर देना एक प्रशंसनीय कर्तव्य समझने वालों को सिवाय दंडनीय अपराधी के किसी और रूप में नहीं पहचाना जा सकता। जो पारंपरिक संस्था इस तरह के ‘संस्कार’ को अपनी विरासत समझती हो और इस तरह के आचरण को बढ़ावा देती हो, उसे भी अभियुक्त वाले कटघरे में ही खड़ा किया जाना चाहिए। पंचायत की चौपाल उसके हवाले करना अराजकता को ही आमंत्रित करना होगा।

इस बात के आसार साफ नजर आने लगे हैं कि खाप पंचायतें सरकार की नरमी के कारण और भी आक्रामक रवैया अपनाने लगी है और उनके तेवर कानून के राज को चुनौती देने वाले बन चुके हैं। शुरुआत शायद तब हुई जब महेन्द्र सिंह टिकैत वाली किसान महापंचायत ने देश की राजधानी की नाकेबंदी कर डाली और सरकार हुक्के की कश खींच धुंआ उगलते इस ‘सरपंच’ के आगे कांपती नजर आई। बाद में राजस्थान में गुर्जर-मीणा संघर्ष के दौरान भी जातीय अस्मिता और जातिवादी ‘पंचायतें’ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ी। अभी हाल में एक अभागे नौजवान ने अपने गोत्र में विवाह के बाद पुलिस संरक्षण प्राप्त कर अपने गांव लौटने का दुस्साहस किया था। कानून का कवच उसके काम न आया, जब दंगाई भीड़ ने उसे और उसकी पत्नी को घेर लिया। चार-छह जितने भी सिपाही थे, जान बचाकर भाग लिए और नव दंपत्ति की लाश सरे आम उनके घर वालों के सामने बिछा दी गई। कुछ समय बाद जब दिलेर पत्रकार उस गांव में पहुंचे तो कैमरे के सामने बेखौफ मुखर होने वाले दबंग नौजवानों ने इस घटना पर संतोष प्रकट किया और बड़े गर्व के साथ कहा कि गोत्र और गांव की बेइज्जती का बदला ले लिया गया। तब से दो-चार और ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। एक और नवविवाहित परिवार की व्यथा यह है कि उसकी जान तो ब़ख्श दी गई है, पर उसे सपरिवार गांव बाहर कर दिया गया है। कानूनी हस्तक्षेप की धौंस-धमकी बेकार साबित हुई है। खाप पंचायत की एक और बैठक ने अपने पुराने फैसले पर ही मुहर लगाई है कि ‘अपराधी’ परिवार को आजीवन गांव से निष्कासन का दंड भोगना पड़ेगा। गांव देहात की जिंदगी की असलियत यह है कि जीविकोपार्जन खेती-बाड़ी से जुड़ा होता है। इस सजा का अर्थ न केवल बेघर होना है, बल्कि इसके साथ ही बेरोजगार भी हो जाना। आजादी के छह दशक बाद भी यह जनतांत्रिक गणराज्य अपने नागरिकों की जिंदगी निरापद रखने में असमर्थ है। सबसे दुखद यह है कि इन निर्दोष नौजवान नागरिकों की जान लेने वाले देश के कानून को खुल्लम-खुल्ला चुनौती देने वाले पंच परमेश्वर की स्थिति में प्रतिष्ठित किए जा रहे हैं।

संविधान में संशोधन कर जनतंत्र को जड़ों तक पहुंचाने के लिए पंचायती राज कानून पारित किया गया है। उस प्रणाली में जिन पंचायतों का उल्लेख है, उनका कोई दूर-दराज का नाता इन तानाशाह बर्बर पंचायतों से नहीं है, जिनका वर्णन किया गया है। मगर सोचने लायक बात यह है कि अगर यह जातिवादी पंचायतें इस क्षेत्र में इतनी ताकतवर है कि उनकी रजामंदी के बगैर कोई अपने बुनियादी अधिकारों का उपभोग तक नहीं कर सकता और इच्छानुसार शादी-ब्याह करने पर सजा-ए-मौत का ही हक़दार समझा जाता है तब फिर पंचायत राज वाले चुनावों में क्या कोई पत्ता भी इनके इशारे के बिना खड़क सकता है? यह भी छुपा नहीं कि जातिवादी वोट बैंक को भुनाने के लिए बावले विधायक-सांसद किसी ऐसी जातिवादी संस्था के आचरण की आलोचना नहीं कर सकते। तब फिर क्या उम्मीद बची रहती है?

इस तरह के अपराध तब तक समाप्त नहीं हो सकते, जब तक अपराधियों को तत्काल और पारदर्शी ढंग से दंडित नहीं किया जाता। अपराधियों को भगाने और संरक्षण देने वाले गांव को सामूहिक रूप से दंडित किए बिना कुछ नहीं हो सकता। जरूरी हो तो कानून में बदलाव भी लाया जाना चाहिए। निरपराध व्यक्ति या परिवार को बहिष्कृत करने वाले गांव को बहिष्कृत किया जाना चाहिए और सरकारी विकास कार्यक्रमों अनुदान आदि से वंचित। जातिवादी परंपरा, मूल्य और ‘सांस्कृतिक’ विरासत, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में संविधान सम्मत कानून से उपर कभी भी नहीं रह सकते। जनतंत्र का अर्थ जिसकी लांठी उसकी भैंस वाला फैसला देने वाली पंचायत नहीं हो सकती।

pushpeshpant@gmail.com
लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:ये पंच तो परमेश्वर नहीं हैं