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खुद को बदलें

आर्य समाज के दस नियमों में एक है, ‘सिर्फ अपनी उन्नति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए’। सभ्य नागरिकों को अपना व्यवहार इसी प्रकार से स्वेच्छापूर्वक रखना चाहिए। यह नागरिक कत्र्तव्यों का अनुशासन है जिसे सच्चे अर्थो में मनुष्य कहलाने वाले व्यक्ति को अपनी गतिविधियों में समावेश करना चाहिए।

अपने आपको समाज का एक सतत् और सामान्य संयोजक मात्र समझकर चलने की जरूरत है। सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझें। महत्वाकांक्षाओं को साधारण साधना के साथ न जोड़ें और यह आकांक्षा रखें कि आदर्शो के परिपालन में अपने को हर किसी से आगे रखना है। सामूहिक उन्नति को ही अपनी उन्नति मानें। ऐसी मनोवृत्ति और रीति-नीति अपनाना सच्चे अर्थो में धार्मिकता या आध्यात्मिकता है। लोक व्यवहार की भाषा में इसी को समतावाद, समाजवाद आदि नामों से पुकारा और सराहा जाता है।

हम जितने स्वार्थी होते हैं, सभ्य समाज का सदस्य कहलाने से उतने ही दूर हो जाते हैं। हम जीवन में जो कुछ पाते हैं, समाज में रह कर पाते हैं। लोकहित की उपेक्षा करने पर हम कृतघ्न ही कहलायेंगे। दूसरों के साथ व्यवहार करते समय यह भुला दिया जाता है कि अपने को यदि दूसरे की स्थिति में रहना और वह सब सहन करना पड़ता तो कैसा लगता? अधिकांश अनाचार इसीलिए पनपते हैं कि हम लोग अपने लिए मनमर्जी बरतने की छूट चाहते हैं और दूसरों के अधिकारों के हनन की जरा भी परवाह नहीं करते।

पशु-पक्षियों के साथ हमारा व्यवहार प्राय: ऐसे ही अनाचार पर अवलम्बित होता है। चोरी, ठगी, प्रपंच, अन्याय, शोषण पर आधारित अनेकों अपराधों के पीछे अनौचित्य को सहज समर्थन करने, अपनाने का भाव ही काम करता है। इसी कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में अनेकों दुष्प्रवृतियां उपजीं और तेजी से बढ़ी हैं। जरूरत है, मानव चिन्तन और व्यवहार में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की।

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  • Web Title:खुद को बदलें