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कहीं सुन्न न हो जाएं पैर

आज वैस्कुलर डे है। पेरिफेरल वैस्कुलर डिसीज धमनी की मुख्य बीमारी है। इस बीमारी में धमनियां छोटी होती जाती हैं और कभी-कभी तो पूरी तरह से ब्लॉक हो जाती हैं। सामान्यत: पुरुषों में ये समस्या महिलाओं की तुलना में ज्यादा होती है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की हालिया रिसर्च में यह बात सामने आई है कि पेरिफेरल वैस्कुलर डिजीज से ग्रसित 10 प्रतिशत मरीजों में इंटरमिटेंट क्लॉडिकेशन के लक्षण होते हैं यानी मरोड़ उठना। 40 प्रतिशत लोग पैर के दर्द की शिकायत नहीं करते और बाकी बचे 50 प्रतिशत लोगों में विभिन्न किस्म के लक्षण प्रकट होते हैं। विज्ञानी अनुसंधान दर्शाते हैं की पीवीडी उम्र के साथ बढ़ती है। 40 साल से ऊपर के 80 लाख पुरुषों और महिलाओं को पीवीडी की समस्या है। पीवीडी के 30 प्रतिशत रोगियों को हार्ट अटैक से मौत का जोखिम होता है।

क्या है पीवीडी
पेरिफेरल वैस्कुलर डिजीज से मतलब है हाथ-पाँवों की रक्तवाहिकाओं के तंग होने की वजह से खून की आवाजाही कम हो जाना। मैक्स देवकी देवी हार्ट एंड वस्कुलर इंस्टीट्यूट, साकेत, नई दिल्ली में वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ़ अनिल ढल ने कहा, ‘पीवीडी से भी वही खतरे हैं जो कार्डियोवैस्कुलर रोगों से हैं। मधुमेह और धूम्रपान इसकी अहम वजहें हैं।’ पीवीडी की दर उम्र से साथ बढ़ती है अनुमानत: यह दर 50 से 60 वर्ष के लोगों में 1 से 2.5 प्रतिशत होती है और 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में 5 से 9 प्रतिशत होती है। जोखिम के अन्य कारण हैं- हाइपर टेंशन, हाई कोलैस्ट्रॉल, मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली।

लक्षण
इस रोग में रक्त धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा जम जाती है। ये हाथ-पांवों के ऊतकों में रक्त प्रवाह को रोकता है। इस रोग के प्राथमिक चरण में चलने या सीढ़ियां चढ़ने पर पैरों और कूल्हों थकाना या दर्द महसूस होता है। अन्य लक्षण होते हैं दर्द, सुन्न होना, पैर की पेशियों में भारीपन। शारीरिक काम करते समय मांसपेशियों को अधिक रक्त प्रवाह चाहिए होता है। यदि नसें तंग हो जाएं तो पेशियों को पर्याप्त खून नहीं मिलता। आराम के वक्त रक्त प्रवाह की उतनी आवश्यकता नहीं होती, इसलिए बैठ जाने से दर्द भी चला जाता है। इसलिए शुरू में मरीज शारीरिक श्रम के वक्त दर्द की शिकायत करते हैं। फिर जैसे-जैसे मर्ज बढ़ता जाता है, मरीज को आराम के समय भी दर्द रहने लगता है।

क्या है वजह
यह बीमारी उन लोगों में ज्यादा होती है, जो हाइपरटेंशन, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, हाईकॉलेस्ट्रॉल के मरीज होते हैं या उनके खून में फैट या लिपिड की मात्रा ज्यादा होती है। साथ ही धूम्रपान ज्यादा करने वालों को भी ये समस्या होती है। इसके अलावा, खून का थक्का जमने के कारण रक्त-शिराएं ब्लॉक हो जाती हैं।

क्या है उपचार
पीवीडी के उपचार में नियंत्रण महत्वपूर्ण रोल निभाता है, जिसमें शामिल हैं - तंबाकू सेवन पर लगाम कसना, हाइपरटेंशन व हाइपर लिपिडेमिया को काबू करना। रिसर्च के मुताबिक फाइबरयुक्त भोजन शुरू करने से कार्डियोवैस्कुलर खतरे में 10 प्रतिशत की कमी आती है। धूम्रपान बंद कर देने से पीवीडी को ठीक करने में बड़ी मदद मिलती है। स्मोकिंग जारी रहेगी तो मर्ज बढ़ता जाएगा और मृत्यु का खतरा बढ़ेगा।

क्या है इलाज
दवा से इलाज के पहलू की बात करें तो वैसोडाइलेटर जैसी दवा का प्रयोग करके रक्त धमनियों को खोला जाता है जिससे ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बेहतर होती है।

पीवीडी के 2 से 5 प्रतिशत मरीजों को जानलेवा इस्केमिया का जोखिम होता है। अगर आपको पीवीडी के साथ गले, जबड़े और कंधे में दर्द महसूस हो, बेहोशी आ रही हो, खुद पर नियंत्रण खत्म हो रहा हो, तो ऐसे मामलों में कोताही नहीं बरतनी चाहिए। 
क्या करें
-धूम्रपान कम करें
-रोजना व्यायाम करें, वॉकिंग कारगर होती है
-पोषण युक्त, कम-फैट युक्त और कम कोलेस्ट्रॉल वाले भोजन का सेवन करें
-पैरों का ख्याल रखें
-रक्त चाप पर नियंत्रण रखें।

ये है जरूरी
जिन मरीजों में पीवीडी होने का पता लग चुका है, उनको शारीरिक रूप से ज्यादा सक्रिय होना पड़ेगा तभी उनकी सेहत सुधरेगी और कार्डियोवैस्कुलर रोग से मौत का खतरा टलेगा। पाया गया है कि शारीरिक सक्रियता और व्यायाम करने से हृदय रोगों से होने वाली मौतों में 20 से 25 प्रतिशत की कमी हुई है। नियमित रूप से त्वचा व पैरों की देखभाल अहम है ताकि त्वचा रोग से बचा जा सके। मरीज को चाहिए की रोजाना अपने पांवों की जांच करें कि उनमें कोई खरोंच, कटना-फटना, जख्म जैसी समस्या तो नहीं है। पैरों को गुनगुने पानी में धोना चाहिए और उन्हें नरम तौलिये से अच्छी तरह सुखाना चाहिए।

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