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विकास का आकाश

कुछ लोगों की आदत होती है कि वे जब भी किसी से मिलते हैं शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठ जाते हैं। उन्हें हर एक से शिकायत रहती है। यहां तक कि स्वयं की परिस्थितियों से भी शिकायत रहती है और इसके लिए भी दूसरों को ही दोषी ठहराते हैं। ऐसे लोग यदि घंटों भी बात करेंगे तो केवल शिकायत ही करते रहेंगे। सारी दुनिया खराब और हमारी किस्मत खराब। ऐसे लोगों से दूसरे लोग प्राय: बचने का प्रयास करते हैं। अत: इस प्रकार के शिकायतपसंद और निराशावादी लोगों का समाज से कटना स्वाभाविक ही है। ऐसे लोगों से अन्य लोग यदि बातचीत करते भी हैं तो मात्र औपचारिकतावश।


यह तो हुई नकारात्मक विचारों से उत्पन्न बाह्य प्रतिक्रिया। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो यही नकारात्मक विचार अथवा भाव आंतरिक रूप से भी हमें जुड़ने नहीं देते। जिस प्रकार नकारात्मक विचारों के कारण समाज से सही जुड़ना संभव नहीं, उसी प्रकार नकारात्मक विचारों के कारण व्यक्ति स्वयं से भी नहीं जुड़ पाता। हमारी बाह्य भावाभिव्यक्ति का उद्गम हमारा मन ही होता है। विचार पहले हमारे मन में उठते हैं। यदि हमारा मन नकारात्मक विचारों से भरा है तो हम अपने स्व से भी एकाकार नहीं हो सकते। नकारात्मक विचार व्यक्ति को कहीं भी शांत-स्थिर नहीं होने देते। ये नकारात्मक विचार ही तो होते हैं, जिनके कारण हम अनेक मनोदैहिक व्याधियों के शिकार हो जाते हैं। व्याधियों से पीड़ित व्यक्ति भी शांत-स्थिर नहीं हो सकता और जब तक हम शांत-स्थिर नहीं होंगे, हमारा अपने स्व से जुड़ाव अथवा आध्यात्मिक विकास संभव नहीं। नकारात्मक भाव या विचार अथवा भावाभिव्यक्ति न केवल व्यक्ति को समाज से अलग कर देती है, अपितु उसके स्व से भी एकाकार नहीं होने देती। इसलिए जरूरी है नकारात्मक भावों से पूर्ण मुक्ति। आंतरिक विकास के लिए जरूरी है बाह्य विकास और बाह्य विकास के लिए जरूरी है आंतरिक विकास। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की ज सकती।

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