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दो टूक

मेट्रो के निर्माण को तो हमने राजनीति से बचा लिया लेकिन उसके हादसों को नहीं बचा पाते। रविवार को जब दुर्घटनास्थल के ढांचे में अटके मजदूरों की लाशें तक नहीं उतारी जा सकी थीं, तभी से राजनीति शुरू हो गई थी। घायल लोगों को ठीक से होश तक नहीं आया था और राजधानी के सियासतबाज सरकार से इस्तीफे की मांग करने लगे थे!

यह नजारा मेट्रोमैन श्रीधरन के इस्तीफे की पेशकश से भी ज्यादा दुखद था। मेट्रो के विराट और अत्याधुनिक नेटवर्क पर दिल्ली और एनसीआर को नाज़ है। उससे जुड़ी दुर्घटनाएं दुखद तो हैं लेकिन वे इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का रुतबा कम नहीं कर सकतीं। क्या एक दो हादसे इस महान इंजीनियरी परियोजना से जुड़े आत्मगौरव पर हावी हो जाएंगे? उसे क्या राजनीति के क्षुद्र और अल्पकालिक सरोकारों से दूर नहीं रखना चाहिए?

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