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इतने कमजर्फ़ क्यों हैं ऊंचे मकान वाले

भारत का सरकारी बजट रहस्यमय दस्तावेज होता है। कुछ साल पहले तक बेहद गोपनीय भी था। उसके उपबंध किसी खास वर्ग के  वारे-न्यारे कर सकते हैं। या बर्बाद। सबसे रोचक पहलू है इसका विवेचन। विपक्ष के लिए यह हमेशा जन-विरोधी होता है। हाथी की सूंड़ या पूछ की तरह विशेषज्ञ अपने-अपने तईं इसे देखते हैं। किसी का जन सुदूर गाव का खेत मजदूर है। किसी का शहरी रिक्शेवाला। कारखाने में दिहाड़ी पर काम करने वाला। सरकारी दफ्तर का छोटा बाबू भी।

इसके ऊपर के लोग भी अपने को आम आदमी मानते हैं। इतने किस्म के आम आदमियों वाले देश में कुछ साल पहले तक बजट का परीक्षण इस बात से होता था कि क्या महंगा हुआ और क्या सस्ता। एक टैक्स के लगने या कटने मात्र से चीज को सस्ता या महंगा मान लिया जता था। शाम को बजट सिर पर सवार रहता था और रात होते-होते दूरदर्शन के ‘हम लोग’ या विविध भारती के ‘हवा महल’ के पात्रों के हर्ष या विषाद के साथ भुला दिया जाता था।

उस जमाने में नोटों की गड्डी इस तरह मोटे स्टैपल्स से जोड़ी जाती थी कि आम आदमी उसे खोल ही न पाए। उद्देश्य था गड्डी को किसी संभावित हेर-फेर से बचाना। आम आदमी के हितों की रक्षा के लिए सरकार बेहद चिंतित रहती थी। तमाम सरकारी कार्यक्रमों का उद्देश्य आम आदमी था। आप शायद न मानें, पर मुझे लगता है भारतीय व्यवस्था का सबसे बड़ा रिफॉर्म है नोटों की गड्डी में संगीनों की तरह जड़े स्टैपल्स से मुक्ति।

बहरहाल एक रोज प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बताया कि आम आदमी के नाम सरकार की ओर से भेजे गए मनीऑर्डर के सौ में से पच्चसी रुपए बीच के आदमी खा जाते हैं। आम आदमी के साथ-साथ इस देश का सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति बीच का आदमी यानी बिचौलिया है। राजीव गांधी की राजनीति को खत्म करने के लिए उनके विरोधियों ने बोफोर्स के बिचौलियों का इस्तेमाल किया। नोटों की गड्डी में से काटे निकल गए, पर बिचौलिए नहीं गए। और अब जब सरकार नरेगा और फूड सिक्योरिटी वगैरह की बात कर रही है तब इस बीच के आदमी की बातें फिर से उठ रहीं हैं। जनता तक मदद तो वही पहुचाता है ना।

बजट आर्थिक दस्तावेज है। इसका पता बजट वाले रोज अंग्रेजी चैनलों की चिर-परिचित मेजों के इर्द-गिर्द बैठे उनीदी आखों वाले अर्थशास्त्रियों को देखकर लगता हैं। वे किसी को (अंग्रेजी दर्शकों को भी) न समझ में आने वाली शब्दावली में कुछ न समझ में आने वाली बातों के साथ दूसरे को समझने और उसकी बात न समझने की कोशिश करते हुए लगते हैं। कीमती ब्रेकों के बीच की गैर-जरूरी जगह को भरकर वे चले जाते हैं।

बजट आने के घंटा भर पहले वे अवतरित होते हैं, जैसे टी-20 मैच के पहले क्रिकेट विशेषज्ञ बैठे रहते हैं। उधर भी अब क्रिकेट विशेषज्ञों की जगह फिल्मी सितारों, लोकप्रिय टीवी एंकरों और रेडियो जॉकियों ने ले ली है। उम्मीद है अगली बार से बजट चर्चा प्रीटी जिंटा, शिल्पा शेट्टी, रोशनी और रोहित वगैरह करेंगे। आम आदमी को समझ में आने वाली कुछ बातें तो होंगी। बहरहाल, इस बार विशेषज्ञ बिग बैंग रिफॉर्म की उम्मीद लेकर बैठे थे। वित्तमंत्री का भाषण शुरू होने के पहले शेयर सूचकांक ने चढ़ना शुरू कर दिया। भाषण शुरू होने के पन्द्रह मिनट बाद तक चढ़ता रहा। फिर शायद दलाल स्ट्रीट में किसी ने कहा, क्या कर रहे हो भैयो। ये तो आम आदमी का बजट नजर आ रिया है। बेचो और पिछले दरवाजे से निकल्लो। उस दिन समझ में आया, बजट राजनैतिक दस्तावेज है।

नो रिफॉर्म, फिस्कल डैफिसिट 6.8 परसेंट और स्लगिश टैक्स रिवेन्यू। इट्स अ कूड़ा बजट। आधुनिक और स्मार्ट हिन्दी में एक सज्जन दूसरे को समझ रहे थे। काफी लोगों को इस बार के बजट से धक्का लगा। सामाजिक कल्याण पर अब तक के सबसे बड़े खर्चे वाला बजट है। इसकी जानकारी मिलने पर एनजीओ सेक्टर ने एक-दूसरे के साथ उसी तरह ताली मारी जसे गे अधिकारवादियों की खुशी। अब तक के सबसे बड़े सरकारी खर्च का बजट क्या रिफॉर्म विरोधी है? पिछले कुछ साल से बजट कुछ नई नीतियों की घोषणा का दस्तावेज भी बनता है। जरूरी नहीं कि हर बार ऐसा हो। वाम मोर्चा की नामौजूदगी में इनक्ल्यूसिव ग्रोथ की बात करके सरकार यही बताना चाहती है कि यह  दबाव में नहीं हमारे स्वभाव में है। हम हैं गरीबी हटाओ के मूल विक्रेता।

एक तबके को लगता है कि रिफॉर्म का मतलब है सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों से पीठ फेरना। रिफॉर्म की जरूरत है। बल्कि लगता है पेट्रोलियम पदार्थो पर भारी सब्सिडी का दौर खत्म हो रहा है। सरकार रिफॉर्म को चुपके से और अलग पैकेज में लाना चाहती है। एक उम्मीद थी कि सरकार बढ़े हुए खर्चों को पूरा करने के लिए पूंजी विनिवेश का सहारा लेगी।

आर्थिक सव्रेक्षण ने 25,000 करोड़ के वार्षिक लक्ष्य की संभावना भी जगा दी। बजट में लक्ष्य रखा है कुल 1,120 करोड़ का। राजकोषीय घाटा जीडीपी का कितना प्रतिशत होगा, इसपर अभी कई तरह की राय हैं। अभी जीडीपी का नॉमिनल अनुमान भी सही नहीं है। उद्योग जगत को यह भी समझना चाहिए कि एक्साइज डच्यूटियों में दी गई छूट अभी कायम है। सरकार की मंशा गरीबों के पास पैसा पहुचाने की है। नरेगा को दूसरे सामाजिक कार्यक्रमों के साथ किस तरह जोड़ा जय, इस पर विचार होना चाहिए। इनका डिलीवरी मैकेनिज्म क्या हो, यह निर्धारित करना दूसरी जरूरत है। भ्रष्टाचार से लिप्त सरकारी व्यवस्था किस तरह काम करेगी, यह देखना चाहिए।

बजट के ठीक पहले नंदन नीलेकणी को राष्ट्रीय पहचान-पत्र कार्यक्रम का प्रमुख बनाकर सरकार ने एक दूसरी दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। कहना मुश्किल है कि यह सफल होगा या नहीं, पर इतना साफ है कि विदेश मंत्रालय के पास पासपोर्ट का डेटाबेस, वित्तमंत्रालय के पास पैन कार्ड का, गृहमंत्रालय के पास आतंकियों का, राज्य सरकारों के पास बीपीएल और चुनाव आयोग के पास वोटरों का डेटाबेस रखने से बेहतर है कि एक राष्ट्रीय पहचान का डेटाबेस बने। भ्रष्टाचार व्यवस्था की शक्ल में है। पहले उसे पहचानने और फिर उसे दूर करने वाली व्यवस्था कायम करने की जरूरत है। भारत और इंडिया दो वास्तविकताएं हैं। इंडिया के पास दुनिया की सबसे अच्छी आईटी टेक्नोलॉजी है। उसके सहारे भारत की समस्याओं का समाधान संभव है। उसका भारत से बैर नहीं है। जिनका बैर है, वे इंडिया में भी हैं और भारत में भी।

pjoshi @hindustantimes. com

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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