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युद्ध और प्रेम

कहते हैं- युद्ध और प्रेम में सब कुछ क्षम्य है। अर्थात दोनों ही स्थितियों में संवेग अपने चरमोत्कर्ष पर रहता है। दोनों में दो पात्रों का होना आवश्यक है। दो व्यक्ति, दो परिवार या दो देश। युद्ध में जहां प्रतिद्वंद्विता की स्थिति है, वहीं प्रेम में पूरकता की। परंतु व्यक्ति समाज या देश की भावनाओं को इस हद तक उकसाने वाली स्थितिया बननी चाहिए, जो दोनों पक्षों को मरने-मारने की मानसिकता तक पहुचा दे। युद्ध में इस्तेमाल की गई गालिया, गोलियों और विभिन्न औजारों का निषेध नहीं होता। छल-कपट से ही युद्ध जीतना है। खेल के मैदान में यही मन:स्थिति होती है। किलिंग स्पिरिट।

प्रेम में भी मरने-मारने की स्थिति आ जाती है। एक दूसरे को जीत लेने की ऐसी उत्कंठा होती है कि सही और गलत व्यवहारों की पहचान नहीं हो पाती। अपने परायों का भेद मिट जाता है। प्रेम में आंखों पर पट्टिया बंध जाती हैं। इसलिए सामाजिक व्यवहारों को ताक पर रखकर भी व्यक्ति को जीतने का लक्ष्य रखा जाता है। घृणा या प्रेम को प्रगाढ़ करने के मार्ग ढूढ़े जाते हैं।

युद्घ और प्रेम की जीत के बीच आए व्यवहार सामान्य नहीं होते। मन सामान्य होने पर लोगों को स्वयं अटपटा लगता है- ‘अरे! मैंने यह क्या कर डाला।’ परंतु उस वक्त उसे अपना व्यवहार अटपटा नहीं लगता। उसे जीत की ही संभावना दिखती है। दोनों की आयु अवधि भले ही क्षीण हो पर युद्ध, युद्ध है और प्रेम, प्रेम। दोनों में जीत की गहनतम संवेग होना ही चाहिए। दोनों ही में जीत या हार के उपरांत एक ही मानसिकता होती है। जीत की जहां खुशी होती है, वहीं हार पर दु:ख। जीत के भाव संभालना भी कठिन होता है और हार की मानसिकता सहना भी।

युद्घ की समाप्ति और प्रेम उन्माद के सामान्य होने पर ऐसी अनुभूति होती है, अर्थात दोनों ही स्थितियों में वह जिन्दा रहा/रही। अटपटे व्यवहार और बातें तो युद्घ और प्रेम की थी। तब समझ जाता है कि दोनों स्थितियों में विजय हुई।

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  • Web Title:युद्ध और प्रेम