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ऊंची दुकान के पकवान

अभी संपन्न हुए जी-8 सम्मेलन का सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह आखिरी जी-8 सम्मेलन था। यह बात इस सम्मेलन में स्वीकार कर ली गई कि जी-8 को अब जी-14 बनाना होगा। आमंत्रित छह ऐसे देशों को भी इसमें शामिल करना होगा, जिनकी शिरकत के बिना विश्व अर्थव्यवस्था में किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन के बारे में सोचा नहीं ज सकता। यह उत्तर शीत युद्ध युग का यथार्थ जी-8 की समाप्ति का कारण बना है।

जी-8 या जी-14 जैसे संगठन यूं भी कोई औपचारिक संगठन नहीं होते लेकिन इनका महत्व औपचारिक संगठनों से ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि ये ऐसे देशों के संगठन होते हैं जिनमें और जिनके आर्थिक या राजनैतिक हितों में कुछ समानता होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ जसे संगठन इतने बड़े हैं कि उनका औपचारिक महत्व ज्यादा है या उनके यूनीसेफ ओर डब्लूएचओ जसे संगठनों का ही कुछ ठोस काम नजर आता है। डब्लूटीओ जसे संगठनों में इतने विवाद हो जते है कि उनसे किसी नतीजे पर पहुंचने की उम्मीद नहीं होती। हालांकि जी-8 के इस सम्मेलन में 2010 तक दोहा बातचीत को सिरे पहुंचाने की बात हुई है लेकिन ऐसा कैसे संभव होगा यह देखना होगा।

जी-8 में छह उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के शामिल होने से यह भी होगा कि इसमें भी किसी नतीजे पर पहुंचना ज्यादा मुश्किल होगा, क्योंकि विकसित और विकासशील देशों के हित कई मुद्दों पर टकराएंगे और ये मुद्दे अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण होंगे। इस बार ऐसा टकराव ग्रीन हाउस गैसों के उत्सजर्न के मुद्दे पर दिखा जिसका आसानी से हल नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में भी हितों का टकराव स्पष्ट है।

खासकर ऐसे वक्त में जब विकसित देशों की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है और भारत और चीन जसे देश अपेक्षाकृत तेजी से तरक्की कर रहे हैं तब विकसित देशों से किसी किस्म की रियायत की उम्मीद करना मुश्किल है। लेकिन विकसित देश यह भी जानते हैं कि उनकी और बाकी दुनिया की अर्थव्यवस्था का उद्धार इन देशों पर बहुत हद तक निर्भर है, इसलिए उन्हें हतोत्साहित भी नहीं किया जा सकता। दरअसल यह एक नई विश्व अर्थव्यवस्था के बनने का समय है और ऐसे में तमाम मतभेदों और ठहरावों के बावजूद ऐसे संगठनों का महत्व असंदिग्ध है और जैसी कि अर्थव्यवस्था की मजबूरियां हैं, वे न्यूनतम साझ कार्यक्रम पर राजी भी होते रहेंगे। इसलिए जी-8 का विस्तार एक अच्छी खबर है।

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