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उमा के दल में अब कांग्रेस की सेंध

उमा के दल में अब कांग्रेस की सेंध

भारतीय जनशक्ति पार्टी (भाजश) की अध्यक्ष उमा भारती की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। मदनलाल खुराना, डॉ. गौरीशंकर शेजवार, राुनंदन शर्मा और प्रहलाद पटेल जैसे सिपहसालारों के भाजश को अलविदा कहते हुए भाजपा में वापसी के सदमे से उमा की अगुवाई वाला दल अब तक नहीं उबर सका है।

ऐसे में पार्टी के लिए एक और बुरी खबर यह है कि भाजश के राष्ट्रीय सचिव इंदर प्रजापत अपने पुराने घर यानी कांग्रेस का रुख करने के तैयारी में हैं। उनका दावा है कि वह 14 जुलाई को फिर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करेंगे और उनके साथ भाजश के चंद वर्तमान पदाधिकारियों समेत दस हजार लोग हाेंगे।

प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन प्रभारी महासचिव प्रजापत ने 29 जुलाई 2001 को निजी विवाद के चलते पार्टी नेता माणक अग्रवाल पर गोलियां दागी थीं। इससे अग्रवाल गंभीर रूप से घायल हो गये थे। इस घटना के बाद प्रजापत को न केवल अपने पद से हाथ धोना पड़ा था, बल्कि उनसे कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता भी छीन ली गयी थी। लगभग आठ साल बाद प्रजापत के मन में फिर कांग्रेस के लिए प्रेम उमड़ पड़ा है।

उन्होंने कहा, मेरी पृष्ठभूमि कांग्रेस की ही रही है। मेरी विचारधारा भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कभी मेल नहीं खायी। बहरहाल, प्रजापत की मानें तो कांग्रेस में वापसी से पहले उन्होंने उमा को भरोसे में ले लिया है और उनके मन में संन्यासिन के लिये कोई मैल नहीं है। उन्होंने कहा, मेरी नजर में उमा दीदी अब भी देश की सबसे ईमानदार नेता हैं।

बहरहाल, प्रजापत ने स्वीकार किया कि भाजश कार्यकर्ता इन दिनाें खासे हतोत्साहित हैं, क्योंकि पार्टी आलाकमान ने वे राजनीतिक कदम नहीं उठाये, जो उसे उठाने चाहिये थे। इस सिलसिले में भाजश सुप्रीमो से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई। लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

इस बीच, मध्यप्रदेश कांग्रेस ने पुष्टि की कि प्रजापत की घर वापसी को पार्टी आलाकमान ने हरी झंडी दिखा दी है। प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने कहा कि वह प्रजापत पिछले कई दिन से कांग्रेस में वापसी की कोशिश कर रहे थे। किसी भी पुराने नेता के लौटने से निश्चित तौर पर पार्टी को नई मजबूती मिलती है। भाजपा से सनसनीखेज विदाई के बाद उमा ने 30 अप्रैल 2006 को भारतीय जनशक्ति पार्टी की नींव रखी थी।

वर्ष 2008 में हुए मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजश सुप्रीमो अपने गृह क्षेत्र टीकमगढ़ से हार गयी थीं, जबकि पार्टी के पांच उम्मीदवार चुनाव जीतकर पार्टी का खाता खोलने में कामयाब हुए थे। हालांकि भाजश ने इस चुनाव में 213 सीटाें पर अपने प्रत्याशी खड़े किये थे।

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में उमा ने प्रधानमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी को खुद आगे बढ़कर समर्थन दिया था। साथ ही, उनके लिए वोट भी मांगे थे। उमा को अनुशासनहीनता के आरोप में पांच दिसंबर 2005 को भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद से लगातार उमा की भाजपा में वापसी के कयास लगाये जाते रहे हैं।

संन्यासिन हालांकि ऐसी बातों को सिरे से खारिज करती रही हैं और कहती रही हैं कि न तो उनका भाजपा में लौटने का कोई इरादा है और न ही भाजश की भाजपा में विलय की कोई योजना है।

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